काकोरी कांड का नायक, महान क्रन्तिकारी : अशफाक उल्ला खान

ashfaaq ulla khan

अशफाक उल्ला खान हमारे देश के एक क्रांतिकारी, स्वतंत्रता सेनानी थे, ये चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह जैसे गरम और जिद्दी स्वभाव के क्रांतिकारियों में से एक थे। हमारे देश को स्वतंत्रता दिलाने में अशफाक उल्ला खान का बड़ा योदान है। भगत सिंह की तरह ही अशफाक उल्ला खान को 27 साल की उम्र में फांसी दे दी गई। अशफ़ाक़ उल्ला खान का जन्म उत्तर प्रदेश के शाहजहाँपुर में रेलवे स्टेशन के पास स्थित कदनखैल जलालनगर मुहल्ले में 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था। अशफाक उल्ला खान छ: भाई थे जिसमे सबसे छोटे अशफाक उल्ला खान ही थे, इनके बड़े भाई का नाम रियासत उल्ला खान था।

एक दिन अशफाक के बड़े भाई रियासत उल्ला खान अशफाक को राम प्रसाद बिस्मिल के बारे में बताने लगे क्यूंकि बिस्मिल रियासत के बहुत ही अच्छे मित्र थे। दोनों लोग एक ही क्लास में पढ़ते थे, रियासत ने बिस्मिल के बारे में बताया की वह बहुत ही काबिल व्यक्ति है और वह एक उच्च स्तर का शायर भी है। अशफाक अपने भाई की बातों को सुनकर बिस्मिल से प्रभावित हो गए और बिस्मिल से मिलने के लिए बहुत उतावले थे क्यूंकि अशफाक भी शायरी लिखते थे। एक दिन बिस्मिल खन्नौत नदी के किनारे कुछ लोगों के साथ मीटिंग कर रहे थे तो अशफाक वहां जा पहुंचे। बिस्मिल ने अशफाक को देखा और अपने पास बुलाया, इसके बाद बिस्मिल ने अशफाक से उसका परिचय पूछा जब बिस्मिल को पता चला की अशफाक उनके मित्र रियासत का सगा छोटा भाई है और उर्दू भाषा का शायर भी है, तो बिस्मिल ने उसको दुसरे दिन आर्य समाज मंदिर में बाते करने के लिए बुलाया।

अशफाक ने अपने घर में बताया की हमको आर्य समाज मंदिर में बिस्मिल से मिलने जाना है तो उनके घर वालों ने जाने से मन कर दिया क्यूंकि अशफाक एक मुस्लिम समाज के थे लेकिन अशफाक घर वालों के लाख मन करने के बाद भी वहां जा पहुंचे। पहुँचने के बाद दोनों लोगों ने काफी देर तक बाते की और उसके बाद अशफाक भी बिस्मिल की पार्टी मातृवेदी से जुड़ गए। पार्टी से जुड़ने के बाद अशफाक एक ऐक्टिव मेंबर साबित हुए। यहीं से अशफाक उल्ला खान ने बिस्मिल के साथ हिन्दुस्तान की स्वतंत्रता के लिए सेनानी के रूप में लड़ना सुरु कर दिया ।

अशफाक उल्ला खान बहुत ही संघर्ष शील और काबिल सेनानी थे वे अपने भविष्य की भी सोच कर चलते थे उन्होंने बिस्मिल को सुझाव दिया की अगर हम कांग्रेस पार्टी से जुड़ जायेंगे तो आगे हमारी कामयाबी में मदद होगी क्यूंकि उस समय कांग्रेस का बोलबाला रहता था। अशफाक के सुझाव से बिस्मिल भी कांग्रेस पार्टी से जुड़ गए और आगे उनको इससे मदद भी मिली।

बंगाल में जब हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसियेशन के दो जिम्मेदार व्यक्तियों शचीन्द्रनाथ सान्याल व योगेश चन्द्र चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया तो सारी जिम्मेदारी बिस्मिल के कन्धों पर आ गई। जिम्मेदारियों को निभाने में शाहजहां पुर से अशफाक उल्ला खान का बड़ा योगदान था। जब आयरलैण्ड के क्रान्तिकारियों की आवाज पर जबरन धन छीनने की योजना बनायी गयी तो अशफ़ाक़ ने अपने बड़े भाई रियासत उल्ला खान की लाइसेंसी बन्दूक और दो पेटी कारतूस बिस्मिल को उपलब्ध कराये ताकि धनवान लोगों के घरों में डकैतियाँ डालकर पार्टी के लिये पैसा इकट्ठा किया जा सके। जब बिस्मिल ने सरकारी माल को लूटने के कहा तो पूरी भरी मीटिंग में अशफाक ने इसका विरोध किया कहा की अगर हम सरकारी माल को लूटेंगे तो सरकार हमें पकड़ लेगी और जेल में डाल देगी जिससे हमारे सारे प्लान बर्बाद जायेंगे। इतने में मीटिंग के अन्य सदस्य अशफाक के विरोध में बोले की देखा साहब पार्टी में एक मुस्लिम को रखने का नतीजा तभी अशफाक बोले की बिस्मिल जैसा कहेंगे वैसा मै करने के लिए तैयार हूँ। बोले हम आज कुछ नहीं कहेंगे लेकिन कल दुनिया देखेगी की एक पठान ने इस ऐक्शन को किस तरह अंजाम दिया और आगे वही हुआ, अगले दिन 9 अगस्त 1925 की शाम काकोरी स्टेशन से जैसे ही ट्रेन आगे बढी़, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने चेन खींची, अशफ़ाक़ ने ड्राइवर की कनपटी पर बन्दूक रखकर उसे अपने कब्जे में लिया और राम प्रसाद बिस्मिल ने गार्ड को जमीन पर औंधे मुँह लिटाते हुए खजाने का बक्सा नीचे गिरा दिया। लोहे की मजबूत तिजोरी जब किसी से न टूटी तो अशफ़ाक़ ने अपना बन्दूक मन्मथनाथ गुप्त को पकडाया और घन लेकर पूरी ताकत से तिजोरी तोड़ने लगे। अशफ़ाक़ के तिजोरी तोडते ही सभी ने उनकी फौलादी ताकत का नजारा देखा। वरना यदि तिजोरी कुछ देर और न टूटती और लखनऊ से पुलिस या आर्मी आ जाती तो मुकाबले में कई जाने जा सकती थीं; फिर उस काकोरी काण्ड को इतिहास में कोई दूसरा ही नाम दिया जाता।

इस घटना के बाद जब पूरे देश में हलचल मच गयी तो एक-एक करके पुलिस सबको गिरफ्तार करने लगी लेकिन अशफाक फरार होने में कामयाब हो गए और वो दिल्ली चले गए और अपने पुराने दोस्त के पास रहने लगे लेकिन उनके दोस्त ने उनके साथ विश्वास घात किया, उसने अशफाक के बारे में पुलिस को बता दिया और फिर अशफाक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ दिन मुकदमा चलने के बाद 19 दिसम्बर 1927 को अशफाक उल्ला खान को फांसी दे दी गई।