‘ गुलज़ार ‘ ! सदी का सदाबहार कलमकार !

गुलज़ार हमेशा सफ़ेद कुर्ता पहनते हैं! उजली कपास का शफ़्फ़ाक लिबास। किसी को याद नहीं आता, उसने गुलज़ार को कभी किसी और पहनावे में देखा हो।

जवानी के दिनों की तस्वीरों में कहीं वे केशधारी दिखते हैं! पगड़ी, दाढ़ी के साथ कोट-पतलून। कहीं सादा कमीज़ में। साल सतहत्तर की एक फ़िल्म में काला कोट पहनकर वे परदे पर नमूदार हुए थे, किंतु ब्याह भी किया तो सफ़ेद कुर्ता पहनकर ही। जाड़े के दिनों में कभी-कभी बस कुर्ते पर शॉल ओढ़ लेते हैं, हल्के भूरे रंग वाली।

 

जब वो फ़िल्में बनाते थे तो काली चौकोर फ्रेम का चश्मा पहनते थे और अपनी फ़िल्म के अभिनेताओं को पहनाते थे- संजीव कुमार से लेकर जीतेंद्र तक! “इजाज़त” में रेखा और “अंगूर” में दीप्ति नवल को भी पहनाया, ग़नीमत है “ख़ुशबू” में हेमा को बख़्श दिया! वैसी फ्रेम का चश्मा अब तो नहीं पहनते, किंतु कुर्ता अपनी जगह क़ायम है।

शाइर की ये अदा है, ज़िद है। कि सफ़ेद पर सबसे पहले दाग़ लगता है। सफ़ेद पर लगा दाग़ किसी की नज़र से छुपता नहीं। बम्बई की दुनिया कालिमा से भरी है, लेकिन मजाल है जो कहीं दाग़ कोई दिखा सके।

लेकिन बात केवल इतनी ही तो नहीं। हज़ार लोगों ने हज़ार तरीक़ों से गुलज़ार से पूछा होगा, ये सफ़ेद कुर्ता ही क्यों? पता नहीं गुलज़ार ने क्या जवाब दिया होगा। कोई जवाब हो भी नहीं सकता। के ये शाइर के मिजाज़ की एक सिफ़त होती है, उसके चाव और लगाव का एक ब्योरा। ये तफ़सीलें बहोत ज़ाती होती हैं, इनका बयान दुनिया के सामने कठिन है। के ये एक डिग्री होती है, जहां पर जाकर आप अपनी ज़िंदगी के वॉल्यूम को फ्रीज़ कर देते हैं। ये अंदरून अहाते की एक रंगत होती है।

अज्ञेय का मौन तो दुर्निवार था। लोकापवाद उनके इर्द-गिर्द जितना हुआ, कम ही के साथ हुआ होगा, किंतु मौन नहीं तोड़ा तो नहीं तोड़ा। वे घंटों मौन रहते। “सागर-मुद्रा” के इस कवि के जीवन को डॉ. राम कमल राय ने “शिखर से सागर तक” कहा था। इसी सागर ने अज्ञेय से कहा था- “चुप रहो।” उसकी अवहेलना कवि के सामर्थ्य से बाहर थी। सो वे चुपचाप सहते रहे अपनी मर्यादा।

कोएट्ज़ी कभी मुस्कराता नहीं। जब अख़बार पूछते हैं कि आख़िरी बार कोएट्ज़ी कब मुस्कराया था, तो वो ये पढ़कर अकेले में ज़रूर मुस्कराता होगा। ओज़ू की फ़िल्मों में टेम्पोरल मूवमेंट एक निश्चित गति पर रेंगता रहता। निर्मल वर्मा एक अलसाई भाषा में लिखते। ब्रेसां के सिनेमा में भावहीनता के स्मारक रचे जाते, जिसकी सतह के नीचे हाहाकार भरते समुद्र। थॉमस पिन्चोन को चालीस साल से किसी ने देखा नहीं। हाईस्कूल के बाद की उसकी तस्वीरें मुश्किल से मिलती हैं। किताबें वो ज़रूर इफ़रात से लिखता है।

लेखक से क्या काम है, किताब में उसके दस्तख़त हैं। किताब ही पढ़िये ना।

ये बात केवल सफ़ेद कुर्ते की नहीं है। ये अपनी पसंद का रंग पहनने का रिवाज़ भर नहीं है। ये मन की बाधादौड़ को एक ऐसे बिंदु पर रोक देने की प्रतिज्ञा है, जिसके बाद वो कलात्मक उद्यम में हस्तक्षेप ना करे। ये जीवन की गति को एक निश्चित लय पर बांध देना है। दुनिया भी वैसे ही चलती है। सुबहें अपने होने से ऊबती नहीं। भोर को नभ की लालिमा से कोफ़्त नहीं होती, गुलज़ार को सफ़ेद कुर्ते से नहीं। एक न्यूनतम सूचकांक पर जीवन चलता। ग्रामोफ़ोन की सुई कहीं अटकती नहीं। साइकिल चलाने वाला बिना घंटी बजाए आपके पास से निकल जाता।

इस दुनिया में होना ही क्या कम गुनाह था, जो अपने होने के हज़ार छद्म और रचें?

जब शख़्सियत के हरूफ़ बुझ जाते हैं, तभी ना हुनर का इक़बाल बुलंद होता है?

और हुनर के ही तो मायने हैं, होना तो मामूल है। होने भर को भला यहां कौन आया है? होने की रसद चुक जाए तो मज़ा है!

के कुछ ना होता तो ख़ुदा होता।

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