क्रिससम: प्रभु ईसा मसीह के वो सात संदेश जो बदल सकते हैं आपकी जिंदगी 

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दुनिया को शांति, दया और प्रेमपूर्वक रहने का संदेश देने वाले क्रिससम के पर्व को हर साल 25 दिसंबर को मनाया जाता है। ये पर्व मुख्य रुप से ईसाई समुदाय का है, लेकिन दुनियाभर के अलग-अलग धर्म के लोग भी इस पर्व को काफी धूमधाम से मनाते हैं। बता दें, 25 दिसंबर को प्रभु ईसा मसीह या जीसस क्राइस्ट का जन्म हुआ था, उन्हीं के जन्मदिन को क्रिसमस के त्योहार के रुप में मनाया जाता है। इस दिन को कुछ लोग ‘बड़ा दिन’ भी कहते हैं।

संत निकोलस ने अपना पूरा जीवन ईसा मसीह को कर दिया था समर्पित

इस दिन विशेष रुप से चर्च को सजाया जाता है। इसके साथ ही लोग अपने घरों को भी क्रिसमस ट्री और तरह-तरह के सजावटी सामान से सजाते हैं। इस दिन लोग सांता क्लाज बनकर बच्चों को तरह-तरह के गिफ्ट भी देते हैं। बता दें, सांता क्लाज बनकर बच्चों को गिफ्ट देने की परंपरा संत निकोलस के समय से चली आ रही है। संत निकोलस ने अपना पूरा जीवन ईसा मसीह को समर्पित कर दिया था। वो यीशू के जन्मदिन के मौके पर रात के अंधेरे में बच्चों को गिफ्ट दिया करते थे। यही संत निकोलस बच्चों के लिए ‘सांता क्लॉज’ बन गए और वहां से यह नाम पूरी दुनिया में प्रचलित हो गया और उन्ही की याद में लोग क्रिसमस के दिन सांता बनकर बच्चों को गिफ्ट देने लगे।

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क्रिसमस के पहले रात में चर्च में रात्रिकालीन प्रार्थना सभा की जाती है, जो रात के 12 बजे तक चलती है। ठीक 12 बजे लोग अपने प्रियजनों को क्रिसमस की बधाईयां देते हैं और खुशियां मनाते हैं। बाइबल के अनुसार जीसस यानी ईसा ईश्वर के बेटे हैं और वे शांति व प्रेम के मसीहा भी हैं। लोग उन्हें प्यार से यीशू भी कहते हैं।

अब बात करते हैं प्रभु ईसा मसीह के दिए गए उन पवित्र संदेशों की जो हमारे जीवन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बता दें, ईसा मसीह के संदेश प्रेम से परिपूर्ण हैं जो सीधे मनुष्य के दिल को छू जाते हैं। ईसा मसीह इंसान को भौतिकता के मोह को त्यागकर, सेवा और परोपकार का रास्ता चुनने का संदेश देते हैं। उनकी शिक्षाएं जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाली हैं। ईसा मसीह लोगों के प्रति दयावान बनने की शिक्षा देते हैं। वो कहते हैं कि जिनका मन शुद्ध है वो परमेश्वर को देख सकते हैं।

ईसा मसीह के संदेश

ईसा मसीह की पहली वाणी थी- ‘हे पिता इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।’
उन्होंने अपनी दूसरी वाणी में कहा कि,  ‘मैं तुझ से सच कहता हूं कि आज ही तू मेरे साथ स्वर्गलोक में होगा।’
तीसरी वाणी, ‘हे नारी देख, तेरा पुत्र। देख, तेरी माता।’
चौथी वाणी,’हे मेरे परमेश्वर, तूने मुझे क्यों छोड़ दिया?’।
ईसा मसीह ने अपनी पांचवी वाणी में कहा था, ‘मैं प्यासा हूं’।
छठी वाणी के रूप में उन्होंने कहा था, ‘पूरा हुआ।’
ईसा मसीह की आखिरी वाणी थी, ‘हे पिता, मैं अपनी आत्मा तेरे हाथों में सौंपता हूं।
प्रेम और मानवता का संदेश देने वाले ईसा मसीह की ये सात वाणियां हमें मानवतावादी बनने की राह दिखाती हैं।

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जाने क्यों दी गई थी ईसा मसीह को मृत्युदंड

ईसाई धर्म के अनुसार, प्रभु यीशु का जन्म बेथलेहेम में हुआ था। यीशु की मां का नाम मैरी मरियम था और पिता का नाम युसुफ था। वे बढ़ई थे। ईसाई धर्म के लोगों का मानना है कि, ईसा मसीह को मृत्युदंड इसलिए दिया गया था क्योंकि, वे लोगों की अज्ञानता दूर करने के लिए उन्हें शिक्षित करने का काम कर रहे थे। उस समय यहूदियों के कट्टरपंथी रब्बिरयों यानी कि धर्मगुरुओं ने प्रभु यीशु का बहुत विरोध किया था। कट्टरपंथियों ने उस वक्त के रोमन गवर्नर पिलातुस से यीशु की शिकायत कर दी थी। माना जाता है कि, उस समय रोमन हमेशा इस बात से डरता था कि कहीं यहूदी क्रांति न कर दें. ऐसे में कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए पिलातुस ने यीशु को सूली पर लटकाकर जान से मारने का आदेश दे दिया था। प्रभु यीशु को मौत से पहले बेहद ही दर्दनाक यातनाएं दी गई थी जिसे सुनकर किसी की भी रूह कांप सकती है।

ईशा मसीह ने अपने शत्रुओं को भी कर दिया था माफ़

खुद को सूली पर लटकाए जाने के बाद भी यीशु भयभीत या क्रोधित नहीं हुए औऱ उन्होंने अपने क्रूर शत्रुओं को माफ कर दिया। इसके साथ ही ईसा मसीह ने परमेश्वर से कहा हे ! मेरे ईश्वर तूने मुझे क्यों अकेला छोड़ दिया? इन्हें माफ करना क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं। सूली पर लटकाए जाने के तीन दिन बाद यीशु जीवित हो उठे। कुछ घंटों उनका दिव्य शरीर सूली पर झूलता रहा अंत में उनका सिर नीचे की ओर लटक गया और इस तरह आत्मा ने शरीर से विदा ले ली। प्रभु यीशु के इस बलिदान को सुनकर आज भी लोगों की आंखे नम हो जाती हैं।