भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में जातिगत भेदभाव एक लंबे समय से चली आ रही समस्या रही है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने इस समस्या का समाधान करने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के संवर्द्धन हेतु विनियम, 2026 को अधिसूचित किया है। यह नियम 13 जनवरी 2026 को जारी हुए और 2012 के पुराने नियमों को अद्यतन करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी), अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), महिलाओं, दिव्यांगजनों और अन्य हाशिए पर रहने वाले समूहों के खिलाफ होने वाले भेदभाव को रोकना है।
यह कानून उच्च शिक्षा संस्थानों (एचईआई) को अनिवार्य रूप से समान अवसर केंद्र (ईओसी) स्थापित करने का निर्देश देता है, जो भेदभाव की शिकायतों का निपटारा करेगा। पिछले कुछ वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में भारी वृद्धि हुई है—2019-20 में 173 शिकायतें थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। ऐसे में यह कानून समयानुकूल है।
यूजीसी कानून 2026 के प्रमुख प्रावधान
यूजीसी के इन नए नियमों में जातिगत भेदभाव की व्यापक परिभाषा दी गई है। भेदभाव को अनुचित, पक्षपाती या भिन्न व्यवहार के रूप में परिभाषित किया गया है, जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से एससी, एसटी, ओबीसी या अन्य समूहों के खिलाफ हो। इसमें जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जन्मस्थान या विकलांगता पर आधारित कोई भी कृत्य शामिल है जो शिक्षा में समानता बाधित करे या मानव गरिमा का उल्लंघन करे।
हर उच्च शिक्षा संस्थान को समान अवसर केंद्र (ईओसी) स्थापित करना अनिवार्य है। इस केंद्र के अंतर्गत समानता समिति का गठन होगा, जिसकी अध्यक्षता संस्थान प्रमुख करेंगे। समिति में एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का अनिवार्य प्रतिनिधित्व होगा। उदाहरण के लिए, 9 सदस्यीय समिति में कम से कम 5 सदस्य इन वर्गों से होने चाहिए। यह समिति शिकायतों की जांच करेगी और समाधान सुझाएगी।
संस्थानों को छह मासिक रिपोर्ट ईओसी द्वारा और वार्षिक रिपोर्ट यूजीसी को प्रस्तुत करनी होगी। यूजीसी राष्ट्रीय स्तर पर एक निगरानी समिति गठित करेगा, जिसमें सांविधिक निकायों और नागरिक समाज के प्रतिनिधि शामिल होंगे। यह समिति कार्यान्वयन की समीक्षा करेगी और कम से कम वर्ष में दो बार बैठक करेगी।
कानून का पालन न करने पर सजा
ये नियम केवल सलाहकारी नहीं, बल्कि प्रवर्तनीय हैं। उल्लंघन करने वाले संस्थानों को कड़ी सजा का सामना करना पड़ सकता है:
- यूजीसी की योजनाओं से बहिष्कार।
- डिग्री, डिस्टेंस या ऑनलाइन कार्यक्रम चलाने पर रोक।
- यूजीसी मान्यता रद्द करना।
इससे संस्थानों में जवाबदेही बढ़ेगी और भेदभाव कम होगा।
कानून का ऐतिहासिक संदर्भ
भारतीय संविधान में ही समानता की गारंटी है। अनुच्छेद 15 राज्य को एससी/एसटी के लिए शैक्षणिक संस्थानों में विशेष प्रावधान करने का अधिकार देता है। 93वें संशोधन से निजी संस्थान भी शामिल हुए। 1989 से ही एससी-एसटी के खिलाफ भेदभाव पर कानून मौजूद है, लेकिन ओबीसी को स्पष्ट सुरक्षा नहीं मिली थी। 2026 के नियम इस कमी को पूरा करते हैं।
पिछले वर्ष फरवरी में यूजीसी ने मसौदा जारी किया था, जिस पर चर्चा हुई। शिकायतों में 118% वृद्धि के आंकड़े सुप्रीम कोर्ट और संसद समिति के सामने रखे गए।
विवाद और विरोध के कारण
नए नियमों को लेकर सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के छात्रों और अभिभावकों में असंतोष है। उनका आरोप है कि इक्विटी कमेटी सवर्ण छात्रों को फंसाने का हथियार बनेगी। सोशल मीडिया पर #UGCNewRules जैसे ट्रेंड चल रहे हैं। आगरा, गाजियाबाद, दिल्ली-एनसीआर में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। बीजेपी के कुछ नेताओं ने भी आलोचना की है।
कांग्रेस नेता अजय कुमार लल्लू ने कहा कि 1989 का कानून पहले से मौजूद है, अतिरिक्त नियम जरूरी नहीं। लेकिन समर्थक तर्क देते हैं कि शिकायतों की संख्या बढ़ रही है, इसलिए सख्ती जरूरी है।
कानून के फायदे और चुनौतियां
फायदे:
- हाशिए पर समूहों को न्याय मिलेगा।
- परिसरों में समावेशी माहौल बनेगा।
- संस्थागत जवाबदेही बढ़ेगी।
चुनौतियां:
- समितियों का दुरुपयोग हो सकता है।
- प्रशासनिक बोझ बढ़ेगा।
- छोटे संस्थानों के लिए संसाधन की कमी।
यूजीसी को इन चुनौतियों से निपटने के लिए प्रशिक्षण और दिशानिर्देश जारी करने चाहिए।
निष्कर्ष
UGC Kanun 2026 उच्च शिक्षा में समानता लाने का महत्वपूर्ण प्रयास है। जातिगत भेदभाव को जड़ से समाप्त करने के लिए अनिवार्य समितियां और निगरानी तंत्र स्वागतयोग्य हैं। हालांकि, विवादों के बीच संतुलित कार्यान्वयन जरूरी है ताकि सभी वर्गों का भरोसा बना रहे। शिक्षा मूल रूप से समावेशी होनी चाहिए, और यह कानून उसी दिशा में कदम है। संस्थानों, छात्रों और सरकार को मिलकर इसे सफल बनाना होगा। यदि सही ढंग से लागू हुआ, तो भारत की उच्च शिक्षा अधिक न्यायपूर्ण बनेगी।
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