कौन था चंद्रास्वामी एक धार्मिक-गुरु या गुरुघंटाल ?

2020 में सोनी लाइव पर एक Webseries रिलीज़ हुई स्कैम 1992 स्टोरी ऑफ़ हर्षद मेहता। इस webseries में दिखाया गया है कि हर्षद मेहता दिल्ली में बैठे एक बाबा से फ़ोन पर बात करता है। इस बाबा को ओरिजिनल नाम चंद्रास्वामी है। चंद्रास्वामी अस्सी और नब्बे के दशक में एक बहुत ही ताकतवर नाम था जिसकी पहुंच सत्ता के शीर्ष से लेकर उद्योगपतियों के ड्राइंग रूम तक थी। फिल्म सेलिब्रिटी से लेकर क्रिकेट खिलाड़ी तक बाबा के अनुयायियों में शुमार थे।

चंद्रास्वामी आखिर क्या थे? वो संत थे या षडयंत्रकारी? वो भविष्यवेत्ता थे, या फिक्सर? वो ताकतवर आध्यात्मिक नेता थे, या सत्ता के दलाल? चंद्रास्वामी गुरु थे या गुरुघंटाल?

असल में चंद्रास्वामी हर इंसान की नजर में अलग शख्सियत रहे। विरोधी उन्हें सत्ता का दलाल कहते थे. वहीं उनके अनुयायी उन्हें बेहद ताकतवर आध्यात्मिक गुरू मानते रहे।

साहूकार बाप का साधू बेटा

चंद्रास्वामी का जन्म 1948 में राजस्थान के अलवर में हुआ था. उनके पिता साहूकार थे, जो ब्याज़ से पैसे देने का कारोबार करते थे। बाद में उन्होंने हैदराबाद को अपने कारोबार का ठिकाना बना लिया था।

9 भाई-बहनों में चंद्रास्वामी पांचवीं संतान थे. उनका असल नाम नेमिचंद्र जैन था. बहुत कम वक्त में चंद्रास्वामी ने खुद को एक भविष्यवक्ता, दिमाग पढ़ने की ताकत रखने वाले तांत्रिक यानी जगदाचार्य चंद्रास्वामी के तौर पर मशहूर कर लिया था।

माथे पर लंबा सा तिलक, सफेद रेशम की चादर, लंबी दाढ़ी और गले में बड़ी सी रुद्राक्ष की माला चन्द्रास्वामी के ट्रेडमार्क हुआ करते थे। 1991 में पी वी नरसिंहराव के प्रधानमंत्री बनने के बाद से सत्ता के गलियारों में उनकी पहुंच और उनका दबदबा उस समय चर्चा का प्रमुख विषय बन गया था।

देशी ही नहीं विदेशी नेता भी थे मुरीद

चंद्रास्वामी और उनके करीबी कैलाशनाथ अग्रवाल उर्फ मामा जी मिलकर कभी बेहद ताकतवर हुआ करते थे. वो किंगमेकर कहे जाते थे.

चंद्रास्वामी की पूर्व प्रधानमंत्रियों पी वी नरसिम्हाराव और चंद्रशेखर से नजदीकी की बहुत चर्चा होती थी।

लेकिन उनके अनुयायियों में पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर, ब्रुनेई के सुल्तान, हॉलीवुड अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर, बहरीन के शेख इसा बिन सलमान अल खलीफा, सऊदी अरब के हथियारों के सौदागर अदनान खशोगी, टाइनी रॉलैंड, इराक के नेता सद्दाम हुसैन, मशहूर डिपार्टमेंटल स्टोर हैरोड्स के मालिक अल फैयद भाई और माफिया डॉन दाऊद इब्राहिम जैसे लोग भी थे.

 

1970 के दशक से ही वो बड़े और ताकतवर लोगों से संपर्क बनाने में जुट गए थे। चंद्रास्वामी जयप्रकाश नारायण से लेकर उस वक्त के कैबिनेट मंत्रियों, राज्यपालों और दिग्गज हस्तियों से ताल्लुक बना रहे थे।

चंद्रास्वामी छुटभैये नेताओं को भी उनकी मुश्किलों का हल बताकर मदद करते थे. ऐसे लोगों का तो उनके दरवाजे पर तांता लगा रहता था. लोग उनके पास मनपसंद ओहदे और नियुक्तियां हासिल करने से लेकर तमाम सिफारिशें लेकर आया करते थे। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक चंद्रास्वामी की पहुंच भी जगजाहिर थी.

विवादों से रहा है गहरा नाता

इतने ताकतवर लोगों से संपर्क के चलते जल्द ही चंद्रास्वामी का नाम विवादों से घिर गया था। एक ताकतवर धार्मिक नेता होने के बावजूद चंद्रास्वामी पर ब्लैकमेल करने, धोखाधड़ी करने, विवादित सौदे करने और विदेशी मुद्रा अधिनियम के उल्लंघन जैसे दर्जनों गंभीर आरोप लगे।

चंद्रास्वामी पर हत्या जैसे गंभीर आपराधिक केस भी दर्ज हुए. 1980 और 90 के दशक में चंद्रास्वामी और विवादों का ये नाता इतना गहरा हो गया कि चंद्रास्वामी का उपनाम ही विवाद कहा जाने लगा। उनके धार्मिक नेता होने पर भी सवाल उठने शुरू हो गए ।

 

चंद्रास्वामी पर कई गंभीर आरोप लगे. सबसे बड़ा जो आरोप चंद्रास्वामी पर लगा वो था राजीव गांधी के हत्यारों से ताल्लुक होने का। कांग्रेस ने 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद चंद्रास्वामी पर ये आरोप लगाया था। मिलाप चंद जैन आयोग ने चंद्रास्वामी और हथियारों के सौदागर अदनान खशोगी के रिश्तो की जांच की थी।

आरोप था कि चंद्रास्वामी ने खशोगी और दूसरे अंतरराष्ट्रीय संपर्कों के जरिए तमिल उग्रवादी संगठन लिट्टे ( लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) को पैसों से मदद कराई थी। आपको पता है कि राजीव गांधी की हत्या का इल्जाम लिट्टे पर ही लगा था।

उस वक्त के प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव भी चंद्रास्वामी के मुरीद माने जाते थे। उन्हें दबाव में चंद्रास्वामी के खिलाफ जांच का आदेश देना पड़ा था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1998 में दी थी। इसमें एक पूरा हिस्सा चंद्रास्वामी की पड़ताल से जुड़ा था।

काली के उपासक चंद्रस्वामी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय ने भी जांच की। ईडी ने राजीव गांधी की हत्या की साजिश के लिए पैसे मुहैया कराने के चंद्रास्वामी पर लगे आरोप की जांच की थी। चंद्रास्वामी के विदेश जाने पर रोक लगा दी गई थी। आखिर ये रोक 2009 में हटाई गई।

बाबा का विदेशी कनेक्शन 

इनकम टैक्स विभाग ने चंद्रास्वामी के आश्रम पर छापेमारी की थी. जिसमें अदनान खशोगी को एक करोड़ दस लाख डॉलर देने के सबूत मिले. खशोगी और ईरान के हथियार सौदागर मनूचेर घोरबानीफर पर ईरान-कोंट्रा अफेयर में दलाली करने के आरोपी थे. जिसमें पैसे के बदले में अगवा किए गए लोग छुड़ाए गए थे।

ईरान कोंट्रा विवाद अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में हुआ था। जिसमें अमेरिकी अधिकारियों ने प्रतिबंध के बावजूद ईरान को चोरी छुपे हथियार बेचे थे। जिसके जरिए अमेरिका ने लेबनान में अपने कुछ बंधक नागरिकों को छुड़ाया था। साथ ही निकारागुआ के कोंट्रा विद्रोहियों को आर्थिक मदद पहुंचाई थी।

 

1996 में पी वी नरसिम्हाराव के कार्यकाल में चंद्रास्वामी को गिरफ्तार भी किया गया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने लंदन में कारोबार करने वाले अचार किंग लखूभाई पाठक से एक लाख डॉलर की धोखाधड़ी की थी।

चंद्रास्वामी पर विदेशी मुद्रा अधिनियम के उल्लंघन का आरोप भी कई बार लगा. सुप्रीम कोर्ट ने जून 2011 में चंद्रास्वामी पर 9 करोड़ रुपए का जुर्माना भी लगाया था।

इस बात की कई कहानियां सुनी-सुनाई जाती हैं कि किस तरह चंद्रास्वामी ने बड़े लोगों से रिश्ते बनाए. फिर इन रिश्तों की मदद से अपना काम निकाला. ऐसा कहा जाता है कि सेंट किट्स मामले में वी पी सिंह को फंसाने के लिए भी चंद्रास्वामी की मदद ली गई थी।

चंद्रास्वामी का अंतर्राष्ट्रीय दबदबा

पूर्व विदेश मंत्री कुंवर नटवर सिंह ने अपनी किताब ‘वॉकिंग विथ लायंस- टेल फ्रॉम डिप्लोमेटिक पोस्ट’ में चंद्रास्वामी के बारे में लिखा है। नटवर सिंह ने लिखा है कि 1975 में चंद्रास्वामी उनसे लंदन में मिले थे।

वो ढेर सारी राजनीतिक सिफारिशों के साथ आए थे और ब्रिटिश नेता मार्गरेट थैचर से मिलना चाहते थे. चंद्रास्वामी ने थैचर से मुलाकात के दौरान उन्हें पहनने के लिए एक ताबीज दिया और भविष्यवाणी की कि एक दिन वो प्रधानमंत्री बनेंगी।

पीएम बनने के बाद थैचर उनकी शिष्या बन गई थीं. थैचर की वजह से चंद्रास्वामी ने कई और ताकतवर लोगों से रिश्ते बनाए थे. वो थैचर के कई दोस्तों से कागज पर सवाल लिखवाते थे और फिर उनसे उसे पढ़वाते थे. और बताते थे कि आखिर उन्होंने क्या लिखा था।

कहा जाता है कि चंद्रास्वामी की नरसिम्हा राव से मुलाकात भी सत्तर के दशक में हैदराबाद में एक यज्ञ के दौरान हुई थी. दोनों की पहली मुलाकात जल्द ही पक्की दोस्ती में तब्दील हो गई थी।

जब नरसिम्हा राव 1991 में प्रधानमंत्री बने तो ये दोस्ती और नजदीकी रिश्ते में तब्दील हो गई थी. इस दौरान चंद्रास्वामी ने दिल्ली के कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया में एक शानदार आश्रम बनवाया. उस वक्त उनका आश्रम सत्ता से नजदीकी चाहने वालों का केंद्र बन गया था।

वो ठीक उसी तरह मशहूर हो गए थे, जैसे कभी धीरेंद्र ब्रह्मचारी, इंदिरा गांधी के राज में हुआ करते थे. हालांकि ये कहा जाता है कि चंद्रास्वामी को आश्रम के लिए जमीन इंदिरा गांधी के राज में दी गई थी. कहा ये भी जाता है कि नरसिम्हा राव के कार्यकाल के दौरान चंद्रास्वामी ने अयोध्या विवाद के निपटारे के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की कोशिश भी की थी।

उन्होंने आर्थिक संकट के दौरान ब्रुनेई के सुल्तान से भारत के लिए मदद मांगी थी। जब देश में गणेश की मूर्ति के दूध पीने की अफवाह उड़ी तो चंद्रास्वामी ने दावा किया कि उन्होंने ही भगवान से ऐसा करने की गुजारिश की थी।

नरसिम्हा राव का कार्यकाल खत्म होने के साथ ही चंद्रास्वामी की शोहरत का सितारा भी अस्त होने लगा था। उनके ऊपर तमाम आरोप लगे, जांच शुरू हो गई थी, वो गलत वजहों से ही सुर्खियों में रहते थे।

2004 में सीबीआई ने दिल्ली हाई कोर्ट से चंद्रास्वामी और राजिंदर जैन के रिश्तों की पड़ताल की इजाजत मांगी थी। राजिंदर जैन का राजीव गांधी की हत्या से ताल्लुक बताया जाता था। 2014 में एक कारोबारी ने चंद्रास्वामी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई कि उनके आश्रम में उसके तीन करोड़ के जेवरात लूट लिए गए।

23 मई 2017 को अपोलो हॉस्पिटल में चंद्रास्वामी की मृत्यु हो गई। लेकिन चंद्रास्वामी और उनसे जुड़े विवाद आज भी यदाकदा सुर्ख़ियों में रहते हैं।

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