क्या है गोवा का #SaveMollem प्रोटेस्ट ?

people protesting
Goa

Goa ये नाम सुनते ही हमारे ज़ेहन में आते ख़ूबसूरत Beeches,बलखाती समुद्र की लहरें और रेत पर आराम फ़रमाते बेफ़िक्र सैलानी।

गोवा देश के ही नहीं वरन विदेशी सैलानियों की भी ड्रीम डेस्टिनेशन है।
प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया से लाखों विदेशी पर्यटक गोवा के खूबसूरत हुस्न का दीदार करने आते हैं।
या कहें गोवा की प्राकृतिक सुंदरता लोगों को बरबस अपनी तरफ़ खींच लाती है।
गोवा की असमान भौगोलिक स्तिथि और अद्वितीय प्राकृतिक सुंदरता के कारण इसे हम पर्यटनों का राजा भी कह सकते हैं।
पर्यटन गोवा की अर्थव्यवस्था की बैकबोन है व पर्यटक इसके मेहमान।

लेकिन आप जानते हैं कि दुनिया की हर खूबसूरत वस्तु की एक एक्सपायरी डेट होती है। ये प्रकृति का नियम है और स्वयं प्रकृति का घर गोवा भी इस नियम का अपवाद नहीं।

अपनी ख़ूबसूरती के लिए मशहूर गोवा इन दिनों कुछ दूसरे कारणों से राष्ट्रीय-चर्चा का केंद्र बन चुका है। शायद गोवा की बेशुमार हरियाली को तथाकथित सरकारी विकास की नज़र लग गयी है। आइये जानते हैं क्या है पूरा मामला। ..

दरअसल गोवा सरकार ने सागरमाला प्रोजेक्ट के अंतर्गत गोवा में स्तिथ Mormugao पोर्ट से उत्तरी कर्नाटक तक एक इंडस्ट्रियल कॉरिडोर विकसित कर रही है जिसके अंतर्गत रेल , सड़क और वॉटर मार्ग पुनर्विकसित किये जा रहे हैं।

इसी प्रोजेक्ट को लेकर गोवा में जगह जगह विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि इस प्रोजेक्ट के लिए चिन्हित लैंड सेंसिटिव ईको जोन से गुजरती है। प्रोजेक्ट को मूर्त रूप देने के लिये लाखों पेड़ों की कुर्बानी देनी होगी जो गोवा की सेहत के लिये कई प्रकार से अत्यंत हानिकारक है।

तमाम विरोध प्रदर्शनों और पर्यावरणविदों के चेतावनी के बावज़ूद जब सरकार ने प्रोजेक्ट का काम नहीं रोका तो पिछले रविवार दक्षिणी गोवा के एक गाँव चंदौर में प्रदर्शनकारी आधी रात को रेलवे ट्रैक पर बैठ गए और ड्रम बजाकर पारम्परिक नृत्य करने लगे। मजबूरन रेलवे कर्मचारियों को काम रोकना पड़ेगा.

क्या है सागरमाला प्रोजेक्ट ?

वर्ष 2016 में केंद्र सरकार से हरी झंडी मिलाने के बाद सम्बन्धित प्रदेश सरकारों ने इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर दिया।

कई RTI कार्यकर्ताओं और क़ानूनविदों का दावा किया है कि सागरमाला प्रोजेक्ट ही पूरी समस्या का मूल कारण है। जिसका मुख्य मक़सद ज़्यादा से ज़्यादा बंदरगाहों का निर्माण और उनसे जुड़े सड़क व रेल मार्ग को विकसित कर गोवा को एक coal transportation corridor के रूप में बदल देना है।
सागरमाला प्रोजेक्ट के अन्तर्गत जो चार प्रमुख प्रगतिशील योजनायें जिनसे गोवा का ecosystem बिगड़ने का ख़तरा है… और जिनका लोग विरोध कर रहे हैं वो इस प्रकार हैं

1- रेलवे लाइन का डबलीकरण करना।
2- नये फ्लाईओवर बनाना।
3- ज़ौरी और माण्डवी नदी पर नौ छोटे-बड़े बंदरगाहों को विकसित करना।
4- NH-4-A का चौड़ीकरण करके फोर-लेन बनाना

इस प्रोजेक्ट के पूर्ण होने के बाद सरकार का लक्ष्य है 51 MTPA ( million tonne per annum ) कोयला उन thermal power plants और स्टील प्लांट्स में पहुँचाना, जो वेस्टर्न घाट के अन्तर्गत आने वाले पर राज्यों में स्तिथ हैं। गुजरात, गोवा ,महाराष्ट्र,कर्नाटक, केरल और तमिल नाडु वेस्टर्न घाट के अन्तर्गत आने वाले राज्य है।

क्यों हो रहा है प्रोजेक्ट का चौतरफ़ा विरोध ? क्या इस विरोध के पीछे किसी प्रकार की कोई राजनैतिक मंशा है ? क्या प्रदर्शनकारियों को किसी राजनैतिक प्राप्त है ? या क्या वास्तव में इस प्रोजेक्ट से गोवा के भौगोलिग वातावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेंगे। और ये प्रभाव कितने दूरगामी होंगे ? तथा कैसे ? व लोगों पर इसका कितना असर पड़ेगा ? और क्या ये विऱोध जायज़ है ?

आइये इन प्रश्नों के उत्तर समझने की कोशिश करते हैं।

माइनिंग मामलों एक्सपर्ट और मैनेजमेंट कंसलटेंट ” राजेंद्र काकोदर ” के अनुसार बंदरगाह-विस्तार, रेलवे लाइन का डबलीकरण या फिर नयी सडकों का जाल बिछाना, इन सब से न तो गोवा का और न ही गोवा के लोगों का कोई भला होने वाला है।

उनके मुताबिक़ राज्य सरकार को किसी भी प्रकार के ट्रांसपोर्टेशन से मिलने वाला टैक्स है 2 रुपया per टन कोयला, और 5 रुपया पर टन आयरन कोर। लेकिन cag की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ ज़्यादातर ट्रांसपोर्टर्स ने अपना बकाया अभी तक नहीं चुकाया है जिसके लिए बकायादारों को नोटिस भी भेजे गए हैं।

एक लाइन में कहें तो इस प्रोजेक्ट से कुछ दिग्गज़ उद्योगपतियों के अलावा और किसी को कोई फ़ायदा नहीं होने वाला। जैसा की ज़्यादातर सरकार के दूसरे प्रोजेक्ट्स में होता है। इसके अलावा कोयले के अंधाधुंध इंपोर्ट से विदेशी मुद्रा के भण्डार में भी कमी आयेगी।

निर्माणाधीन कई नये पावर्स प्लांट्स के अस्तित्व में आने के बाद भविष्य में कर्नाटक में भी प्रदुषण का स्तर बढ़ेगा। क्यूँकि ट्रांसपोर्टेशन के दौरान कोयले के महीन कण हवा के संपर्क में आयेंगे जिससे वायु-प्रदूषण बढ़ेगा तथा हवा की गुणवत्ता प्रभावित होगी । चूँकि कोयले का विशिष्ट गुरुत्व सिर्फ़ 0.5 होता है अतः ये पद्दार्थ 3 से 4 दिन हवा में मौजूद रहते हैं।

सरकार का तर्क

सरकार का कहना है कि इस प्रोजेक्ट का निर्माण केवल कोल् ट्रांसपोर्टेशन के लिए नहीं किया जा रहा वरन इसके और भी कई फ़ायदे हैं जिन्हें हाइलाइट्स करने के बजाय छिपाया जा रहा है। तथा केवल कोल् ट्रांसपोर्टेशन के नाम पर विरोध किया जा रहा है। हालाँकि वर्ष 2013 में तात्कालिक मुख्यमंत्री स्व श्री मनोहर पार्रिकर ने विधानसभा में स्वयं यह प्रोजेक्ट नामंज़ूर कर दिया था।

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