क्या वास्तव में CAA से किसी भारतीय की नागरिकता जाने का खतरा है …. ?

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सरकार कह रही है कि सीएए यानी कि नागरिकता संशोधन कानून(CAA) लोगों को नागरिकता देने के लिए है वहीं विरोधी ये कहते फिर रहे हैं कि इस लोगों की नागरिकता छिन जायेगी। दोनों तरफ से बरामद तर्क गढ़े जा रहे है। केरल,पश्चिम-बंगाल के अलावा सभी कांग्रेस शाषित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने अपने-अपने राज्यों में बाकायदा प्रस्ताव पारित कर CAA नहीं लागू करने का निर्णय लिया है । शिवसेना के जाने के बाद NDA के साथ बचे सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी नितीश कुमार ने भी CAA पर सदन में चर्चा की बात कही है। हालाँकि नागरिकता कानून में राज्यों की को बहुत विशेष भूमिका नहीं होती।

लेकिन ये राजनीती है, यहाँ दल-बदलने, और सरकार बदलने में समय नहीं लगता

सरकार व विरोधी दोनों एक-दूसरे को सार्वजनिक मंच पर बहस करने की चुनौती दे रहे हैं। लेकिन जनता को आज तक उस बहस का इन्तजार है।
सारी बहस हो रही टी.वी. चैनलों पर जहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ता एक-दूसरे पर गालियों की उल्टियाँ कर रहे हैं। देश की जनता जो टी.वी. देखती है वो कन्फ्यूजन का शिकार हो चुकी है। जनता ये समझ ही नहीं पा रही कि किसका विरोध करे और किसका समर्थन।

खैर इन सबके बावजूद खूब विरोध हो रहा है और समर्थन भी खूब हो रहा है। सारे दल अपने-अपने कारकर्ताओं को विरोध और समर्थन के लिए उकसाने में कोई कमी नहीं छोड़ रहे हैं।

यदि आप किसी दल के कार्यकर्ता हैं तथा आपने भी मन बना लिया है कि आप को भी caa का विरोध या समर्थन करना है तो जरा ठहर जाईये। विरोध या समर्थन करने से पहले आईये ठीक से समझ लेते हैं कि क्या है ये पूरा मामला। फिर आप इस निर्णय पर पहुंच सकते हैं कि आपको विरोध करना है या समर्थन अथवा दोनों नहीं करना और फिर क्यों ?

इस पूरी प्रक्रिया को लेकर जनता के मन में जो सबसे बड़ा सवाल है… वह यह कि

क्या वास्तव में नागरिक संशोधन कानून से किसी की नारिकता छिन सकती है ?

यदि हाँ तो कैसे ?

और यदि नहीं तो ये स्थिति क्यों बन गयी है जहाँ देश की जनता को एक कानून के विरोध व समर्थन में एक-दूसरे के आमने-सामने लाकर खड़ा कर दिया गया है ? Caa से लोगों की नागरिकता जायेगी ऐसा दुष्प्रचार क्यों किया जा रहा ? वो कौन लोग हैं जो इस प्रकार की भ्रामक अफवाहों को फैलाने का काम रहे हैं ? और क्यों सरकार अफवाहों को फैलने से रोकने में नाकाम रही ? क्या ये मान लिया जाय कि केंद्र सरकार देश की जनता को caa का ठीक मतलब नहीं समझा सकी ?

यदि इस कानून में कोई खराबी नहीं तो क्यों सरकार को अपने ही बनाये कानून के समर्थन में रैलियां करनी पड़ रही हैं ? क्यों समर्थन में सभाओं का आयोजन किया जा रहा है ? प्रधानमंत्री से लेकर भाजपाशासित राज्यों के मुख्यमंत्री तक लगातार, बार-बार सफाई दे रहे हैं ?

आईये इन सारे क्यों की तह तक जाते हैं और इनका जवाब खोजने की कोशिश करते हैं।

CAA से लोगों की नागरिकता कैसे छिन जाएगी इस प्रश्न के जवाब में विपक्ष का कहना है कि :

सरकार देश को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती caa इस प्रक्रिया का पहला चरण है। इसके बाद सरकार nrc लायेगी जिसमें लोगों को साबित करना होगा कि वो इस देश के नागरिक हैं और इसके लिए उन्हें जरूरी दस्तावेज जुटाने होंगे। जो हिन्दू अपनी नागरिकता का कोई भी साक्ष्य उपलब्ध कराने में असमर्थ होंगे उन्हें caa के कारण सरकार से नागरिकता मिल जायेगी लेकिन मुसलमानों को नहीं मिलेगी अतः जो मुसलमान खुद को यहाँ का नागरिक साबित करने के लिए जरूरी दस्तावेज नहीं दिखा पायेगा सरकार उसे डिटेंशन कैंप में डाल देगी। और उसे देश निकाल दिया जायेगा। और इसके लिए विपक्ष असम का उदहारण देता । जहाँ लगभग 19 लाख लोगों के नाम nrc में शामिल नहीं थे उनमें से 12 लाख हिन्दू हैं। तथा सात लाख मुस्लिम।

असम का उदाहरण

विपक्ष का तर्क है कि यदि एक राज्य में nrc लागू करने में  इतनी अनियमितता हुई है, तो कल्पना करिये यदि पूरे देश में nrc लागू होने के बाद की स्थिति क्या होगी ?

इस प्रकार से विपक्ष का तर्क है कि CAA, NPR व NRC ये तीनो एक दूसरे से सहमबन्धित है। CAA, NRC की प्रक्रिया का पहला चरण है। पुरे देश में NRC लागू होने के बाद के बाद छूटे हुए लोगों में से केवल गैरमुस्लिमों को ही CAA का लाभ मिलेगा, बाकी मुस्लिमों की नागरिकता CAA की वजह से छिन जाएगी । क्योंकि CAA में केवल हिन्दू, सिख,जैन,बौद्ध व पारसियों को नागरिकता देने का प्रावधान है।

सरकार का पक्ष :

सरकार का कहना है कि यह कानून लोगो को नागरिकता देने के लिए है। इस कानून के माध्यम से देश में अवैध रुप से रहे हिन्दू, सिख,जैन व पारसी शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करने का रास्ता साफ होगा । इस कानून के अनुसार पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक प्रताड़ना के आधार पर विस्थापित हुए हिन्दुओं,सिखों, जैन व पारसियों को भारत सरकार यहां की नागरिकता प्रदान करेगी। इस कानून का उन लोगो की से कोई लेना देना नहीं है जो पहले से ही इस देश में रह रहे है।

सरक़ार की दलील :

इस कानून से देश के किसी भी नागरिक को कोई खतरा नहीं है। सरकार व स्वयं गृहमंत्री इस मामले पर कई बार सफाई दे चुके हैं कि “किसी को भी कोई दस्तावेज देने की कोई जरुरत नहीं है जो इस देश का नागरिक है उसे चिंतित होने की जरूरत नहीं है, सरकार ऐसी व्यवस्था करेगी कि देश के किसी भी नागरिक को किसी भी प्रकार का कष्ट व असुविधा नहीं होगी”। विपक्ष भ्रम फैला रहा है विपक्ष की बातों में न आये।

CAA में मुसलमानो के साथ भेदभाव करने के प्रश्न पर सरकार का तर्क है कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश ये तीनों ही ईस्लामिक देश हैं यहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक हैं। किंतु हिन्दू, सिख, जैन व पारसी अल्पसंख्यक हैं जो वर्षों से वहाँ धार्मिक प्रताड़ना झेलने को विवश है। यदि वो लोग स्वेच्छा से भारत आते हैं तो इस कानून के माध्यम से उन्हें नागरिकता मिलने में आसानी होगी।

CAA मुस्लिमों से भेदभाव नहीं करता

जहाँ तक मुस्लिमों के साथ भेदभाव करने की बात है तो यदि किसी भी ईस्लामिक देश में कोई मुस्लिम धार्मिक प्रताड़ना से ग्रसित है तो यह ईस्लाम और उस देश की आंतरिक समस्या है न कि हमारी। और फिर क्यों कोई मुस्लिम अपने ईस्लामिक-मुल्क से किसी ऐसे देश में बसना चाहेगा जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं। और यदि कोई मुस्लिम पडोसी देश से आकर भारत में बसना चाहता है तो उसके लिए उसे जरुरी क़ानूनी प्रक्रिया को पूरा करना होगा।
इस प्रकार सरकार का कहना है की इस कानून से किसी भी भारतीय की नागरिकता को कोई खतरा नहीं ये कानून बाहर से आये हुए गैरमुस्लिमों को नागरिकता देने के बारे में है लेकिन विपक्ष इसे NRC से जोड़कर इसकी गलत ब्याख्या कर इसे सांप्रदायिक व देश-विरोधी बता रहा है। इस कानून का विरोध करना बेमतलब है। और सारा विरोध विपक्ष द्वारा प्रायोजित है।

नहीं जाएगी किसी की नागरिकता

इस तरह से ये साफ़ हो जाता है कि caa से देश के किसी की भी नागरिक की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है। लेकिन लोगों के मन में डर है इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता। किंतु यक्ष प्रश्न यह है कि जब इस कानून से देश के किसी की भी नागरिक की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है तो फिर क्यों लोग इस क़ानून का विरोध कर रहे है ?

असम में NRC का मुद्दा

इसकी दो वजहें है पहली असम में NRC का लागू होना एवं उसमें हुयी भीषण अनियमितता। जिसकी वजह से लगभग 19 लाख लोगों के सामने एक अनचाही स्तिथि उत्पन्न हो गयी है। असम एक्ट के अनुसार २४ ऑगस्त 1971 के बाद से देश में रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों को सरकार देश से बाहर निकलना था। इसमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों थे। लेकिन CAA में यह अवधि बढाकर 31 दिसंबर 2014 कर दी गयी है। अर्थात जो शरणार्थी 31 दिसंबर 2014 तक देश देश में आ चुके हैं उनको CAA के तहत देश की नागरिकता मिल जायेगी चूँकि CAA में केवल गैरमुस्लिमों को नागरिकता देने का प्रावधान है अतः वो सारे अवैध नागरिक जो हिन्दू हैं उनको तो भारत की नागरिकता मिल जाएगी लेकिन मुस्लिमों को नहीं। मुस्लिमों को भारत की नागरिकता प्राप्त करने हेतु NATURALIZATION के प्रोसेस से गुजरना होगा।

सरकार व विपक्ष की भूमिका

और दूसरा कारन है सरकार का रवैया दरअसल इस पुरे मामले में सरकार का पक्ष बहुत ही आक्रामक रहा है। देश के गृहमंत्री , प्रधानमंत्री समेत अन्य सभी बड़े नेता अपने-अपने भासणो में विपक्ष पर एवं कानून के विरोधियों पर हमलावर रहे। विपक्ष ने सरकार व उसकी नीतियों खासकर CAA हिंदुसमर्थक, मुस्लिम-विरोधी व संविधान-विरोधी बताते हुए आग में घी डालने का काम किया है। रही सही कसर पूरी की धर्गुरूओं और मज़हब के ठेकेदारों ने जो दोनों पक्ष से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ बराबर ज़हर उगल रहे हैं।

परिकल्पनात्मक स्तिथि

चलिए एक HYPOTHETICAL सिचुएशन में मान लेते है कि वर्ष २०२२ तक पुरे देश में NRC लागू हो के बाद, जो लोग अपनी नागरिकता नहीं साबित कर पाते उन्हें सरकार देश से बहार निकाल देगी। लेकिन क्या ये संभव हो पायेगा ? आप खुद से सोचिये जब CAA को लागू करने को लेकर इतना बवाल हो रहा है
तो वो स्तिथि कितनी भयानक होगी। फिरभी यदि मान लेते है की सरकार ने किसी तरह आर्मी लगाकर लोगों को देश के बाहर निकाल भी दिया। तो देश में दूसरी पार्टी की सरकार बनते ही निष्कासित लोगों फिर से लाने की क़वायद शुरू हो जाएगी। और आने वाले पांच दस वर्षों तक देश में यही सिलसिला चलता रहेगा। तो ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य का क्या होगा ? विश्वगुरु बनने के सपने का क्या होगा ? क्या होगा हमारे आने वाली पीढ़ियों का भाविष्य ? क्या वो भी आगे चलकर हमारी तरह हिन्दू-मुसलमान के नाम पर लड़ेंगे ?

ये सारे अनुत्तरित प्रश्न हमें विचलित करते है और यह सोचने पर मजबूर कर देते है हम किस तरह के भारत का निर्माण कर रहे है ?

उपसंहार :

हमारा अपने हुक्मरानों से अनुरोध है की कृपया इस नफ़रत की राजनीती को समाप्त करे। सरकार व तमाम विरोधी दल एक साझा प्रयास के तहत एक मंच पर आये तथा देश की जनता को सन्देश दें के इस कानून से किसी की नागरिकता को कोई खतरा नहीं है। सरकार और विपक्ष को मिलकर लोगो को यह विश्वाश दिलाने की जरुरत है कि यदि इस तरह की कोई भी स्तिथि निकटम भविष्य में उत्पन्न होती है तो उससे निपटने के व्यापक इंतजाम किये जायेंगे।
देश की जनता यदि सारा काम-काज छोड़कर सड़क पर उतर आएगी।एक कानून के समर्थन या विरोध में नारे लगाएगी तो देश की अर्थव्यवस्था का क्या होगा। ५ ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था का सपना कैसे पूरा होगा ?