जानिए किस अपराध पर मिलती है सजा-ए-मौत

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जब कभी आप बलात्कार या आतंकी हमलों की खबर पढ़ते होंगे, तब आपका मन कचोट जाता होगा और सोचते होंगे कि इन दरिंदों को पकड़ कर फांसी पर लटका देना चाहिये, सिर कलम कर देना चाहिये, बलात्कारी के लिये सोचते वक्त मन में आता होगा कि उसका तो लिंग ही काट देना चाहिये। इस तरह के बहुत से ख्याल आपके मन में आते होंगे। आज कल लगातार देश में हो रहे अपराध को लेकर जनता बहुत परेशान है।

जल्द ही कुछ आरोपियों को मिलने वाली है सजा-ए-मौत

जैसा की आपको पता है की हैदराबाद,उन्नाव दिल्ली निर्भया रेप केस सभी इन सभी मामलो में जनता आज लगातार आरोपियों की मौत की सजा की मांग कर रही है। इस चर्चा में चल रहा निर्भया केस मामले में सुनाने में आया था की निर्भया के हत्यारो को जल्द ही फांसी की सजा दी जाएगी। लेकिन अभी उनको फांसी नहीं दी गई है। जनता लगातर उनकी मौत की गुहार कगा रही है। तो आज हम आपको बताते है की किस अपराध में सजा-ए-मौत दी जाती है।

ऐसे अपराध में दोषी को मिलती है सज़ा-ए-मौत

आप अक्सर सुनते और पढ़ते हैं कि हत्या के मामले में अदालत ने आईपीसी यानी भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत मुजरिम को हत्या का दोषी पाया है। ऐसे में दोषी को सज़ा-ए-मौत या फिर उम्रकैद की सजा दी जाती है। लेकिन धारा 302 के बारे में अभी भी काफी लोग नहीं जानते। तो आज हम आपको बताते है की भारतीय दण्ड संहिता यानी इंडियन पैनल कोड और उसकी धारा 302 क्या है।

इन पर नहीं है लागू यह सजा

भारत में होने वाले भारतीय दण्ड संहिता यानी( Indian Penal Code) भारत में यहां के किसी भी नागरिक द्वारा किये गये कुछ अपराधों की परिभाषा और दण्ड का प्राविधान करती है। लेकिन यह जम्मू एवं कश्मीर और भारत की सेना पर लागू नहीं होती है। जम्मू एवं कश्मीर में इसके स्थान पर रणबीर दंड संहिता लागू होती है।

क्या आप जानते है ?

आपको बता दे की भारतीय दण्ड संहिता ब्रिटिश काल में सन् 1862 में लागू हुई थी। इसके बाद समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहे। विशेषकर भारत के स्वतन्त्र होने के बाद इसमें बड़ा बदलाव किया गया। पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी भारतीय दण्ड संहिता को ही अपनाया। लगभग इसी रूप में यह विधान तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के अधीन आने वाले बर्मा, श्रीलंका, मलेशिया, सिंगापुर, ब्रुनेई आदि में भी लागू कर दिया गया था।

धरा 302 कब लगाई जाती है

आईपीसी की धारा 302 कई मायनों में काफी महत्वपूर्ण है। यह धरा कत्ल के आरोपियों पर लगाई जाती है। यदि किसी पर हत्या का दोष साबित हो जाता है। तो उसे उम्रकैद या फांसी की सजा और जुर्माना हो सकता है। कत्ल के मामलों में खासतौर पर कत्ल के इरादे और उसके मकसद पर ध्यान दिया जाता है। इस तरह के मामलों में पुलिस को सबूतों के साथ ये साबित करना होता है कि कत्ल आरोपी ने ही किया है।

आरोप साबित होना

इसके साथ ही आरोपी के पास कत्ल का मकसद भी था और वह कत्ल करने का इरादा भी रखता था। हत्या के कई मामले मामलों में इस धारा को इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह ऐसे मामले होते हैं जिनमें किसी की मौत तो होती है पर उसमें किसी का इरादतन दोष नहीं होता। ऐसे केस में धारा 302 की बजाय धारा 304 का प्रावधान है। इस धारा के तहत आने वाले मानव वध में भी दंड का प्रावधान है।

हत्या के दो तरीके

भारतीय दंड संहिता की धारा 299 में अपराधिक मानव वध को परिभाषित किया गया है। अगर कोई भी आदमी किसी को मारने के इरादे से या किसी के शरीर पर ऐसी चोटें पहुंचाने के इरादे से हमला करता है जिससे उसकी मौत संभव हो या जानबूझकर कोई ऐसा काम करे जिसकी वजह से किसी की मौत की संभावना हो तो ऐसे मामलों में उस कार्य को करने वाला व्यक्ति आपराधिक तौर पर ‘मानव वध’ का अपराध करता है।

अपराध से निपटने के लिए है निम्न कानून

सरल शब्दावली में अपराध किसी व्यक्ति द्वारा किए गए किसी भी कार्य या चूक को संदर्भित करता है जो लागू होने के लिए किसी भी कानून द्वारा निषिद्ध है और जिसे कानून के तहत दंडनीय बना दिया गया है। भारत में अपराध और आपराधिक परीक्षण से निपटने वाले कानून निम्न हैं।

● 1860 भारतीय दंड संहिता
● 1973 आपराधिक प्रक्रिया संहिता
● 1872 भारतीय साक्ष्य अधिनियम।

अभी इतने लोगो को दी गई है फाँसी की सजा

मिथु बनाम पंजाब राज्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 303 के तहत आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे किसी व्यक्ति को आवश्यक रूप से मौत की सज़ा देने को गैरकानूनी माना है। भारत में 1949 में स्वतंत्रता के बाद मौत की सजा प्राप्त लोगों की संख्या बहुत ही काम है। आपको बता दे की अधिकारिक सरकारी आँकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद अब तक केवल 52 लोगों को फाँसी की सजा दी गयी है।