Navratri 2021: माँ चंद्रघंटा व माँ कूष्‍मांडा की पूजा करने का शुभ मुहूर्त व पूर्ण विधि

ma chandraghanta aur ma kushmanda

Navratri 2021: कल 9 अकटूबर को प्रातः कल 7 बजकर 38 मिनट तक तृतीया तिथि है। यानि आपको 7:38 तक मां के तृतीय स्वरूप मां चंद्रघंटा की पूजा कर लेनी है। इसके बाद चतुर्थी तिथि लग जाएगी तो आपको चतुर्थी तिथि पर मां के चतुर्थ स्वरूप मां कूष्माण्डा की पूजा करनी है। तो आइए जानते हैं तृतीय एवं चतुर्थ स्वरूप की कैसे करें पूजा व विधि, शुभ मुहूर्त, आरती, कथा क्या है।

कैसे करें पूजा?

1. प्रातः काल उठकर स्नान करने के बाद पूजा के स्थान पर गंगाजल डालकर उस स्थान को शुद्धि करें।

2. इसके बाद घर के मंदिर में या जहाँ भी आप पूजा कर ते है वहां दीप प्रज्वलित करें। इसके बाद मां दुर्गा का गंगा जल से अभिषेक करें।

3. माता को लाल पुष्प, अक्षत, सिन्दूर अर्पित करें, प्रसाद के रूप में फल और मिठाई चढ़ाएं।

4. धूपबत्ती-दीपक जलाकर दुर्गा चालीसा का पाठ करें और फिर मां की आरती करें।इसके बाद आपको मां को भोग लगाना है।

पूजा मुहूर्त

• ब्रह्म मुहूर्त- 04:40 AM से 05:29 ऍम
• अमृत काल- 08:48 AM से 10:15 AM
• अभिजित मुहूर्त- 11:45 AM से 12:31 PM
• विजय मुहूर्त- 02:05 PM से 02:51 PM
• गोधूलि मुहूर्त- 05:46 PM से 06:10 PM
• रवि योग- 06:18 AM से 04:47 PM

Maa chandraghanta: नवरात्रि के तीसरे दिन देवी चंद्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। कहते हैं कि जो भी साधक मां के इस रूप की आराधना सच्चे मन से करता है, उसके समस्त पाप और बाधाएं नष्ट हो जाते हैं और साधक खुद में अलौकिक माधुर्य को महसूस करता है।

मां चंद्रघंटा के मुकुट में घंटे के आकार में अर्ध चंद्र बना होता है। मां की 10 भुजाएं है जो कि अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित है और मां चंद्रघंटा सिंह पर सवार है। यानी मां का यह रूप युद्ध की मुद्रा में है। जो साधक मां चंद्रघंटा की आराधना करता है उसे यश, कीर्ति और सम्मान संसार में प्राप्त होता है।

Maa kushmanda: नवरात्रि के चौथे दिन माँ कूष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। मां के इस रूप में अष्ट भुजाएं हैं। जिनमें धनुष, बाण, कमंडल, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र, गदा व माला है। जो साधक मां के इस रूप की उपासना करता है अनगिनत लाभ प्राप्त होते हैं।

मान्यता है कि जब चारों तरफ अंधकार था तब मां कूष्मांडा ने पूरी सृष्टि की रचना की थी। मां की हल्की हंसी के द्वारा ब्रह्मांड उत्पन्न हुआ था। इसलिए इन्हें आदिशक्ति या आदिस्वरूपा कहा जाता है।

मां चंद्रघंटा का मंत्र

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकेर्युता।
प्रसादं तनुते मह्यं चंद्रघण्टेति विश्रुता॥

ध्यान के लिए

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रार्धकृत शेखरम्।

सिंहारूढा चंद्रघंटा यशस्वनीम्॥

मणिपुर स्थितां तृतीय दुर्गा त्रिनेत्राम्।

खंग, गदा, त्रिशूल,चापशर,पदम कमण्डलु माला वराभीतकराम्॥

पटाम्बर परिधानां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।

मंजीर हार केयूर,किंकिणि, रत्नकुण्डल मण्डिताम॥

प्रफुल्ल वंदना बिबाधारा कांत कपोलां तुगं कुचाम्।

कमनीयां लावाण्यां क्षीणकटि नितम्बनीम्॥

मां चंद्रघंटा जी की आरती

नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा का ध्यान।

मस्तक पर है अर्ध चन्द्र, मंद मंद मुस्कान॥

दस हाथों में अस्त्र शस्त्र रखे खडग संग बांद।

घंटे के शब्द से हरती दुष्ट के प्राण॥

सिंह वाहिनी दुर्गा का चमके सवर्ण शरीर।

करती विपदा शान्ति हरे भक्त की पीर॥

मधुर वाणी को बोल कर सब को देती ग्यान।

जितने देवी देवता सभी करें सम्मान॥

अपने शांत सवभाव से सबका करती ध्यान।

भव सागर में फसा हूं मैं, करो मेरा कल्याण॥

नवरात्रों की मां, कृपा कर दो मां।

जय माँ चंद्रघंटा, जय मां चंद्रघंटा॥

माँ कूष्‍मांडा देवी मंत्र

या देवी सर्वभू‍तेषु मां कूष्‍मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

ध्‍यान के लिए 

वन्दे वांछित कामर्थे चन्द्रार्घकृत शेखराम्।
सिंहरूढ़ा अष्टभुजा कूष्माण्डा यशस्वनीम्॥

भास्वर भानु निभां अनाहत स्थितां चतुर्थ दुर्गा त्रिनेत्राम्।
कमण्डलु, चाप, बाण, पदमसुधाकलश, चक्र, गदा, जपवटीधराम्॥

पटाम्बर परिधानां कमनीयां मृदुहास्या नानालंकार भूषिताम्।
मंजीर, हार, केयूर, किंकिणि रत्नकुण्डल, मण्डिताम्॥

प्रफुल्ल वदनांचारू चिबुकां कांत कपोलां तुंग कुचाम्।
कोमलांगी स्मेरमुखी श्रीकंटि निम्ननाभि नितम्बनीम्॥

माँ कुष्मांडा स्तोत्र पाठ

दुर्गतिनाशिनी त्वंहि दरिद्रादि विनाशनीम्।
जयंदा धनदा कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

जगतमाता जगतकत्री जगदाधार रूपणीम्।
चराचरेश्वरी कूष्माण्डे प्रणमाम्यहम्॥

त्रैलोक्यसुन्दरी त्वंहिदुःख शोक निवारिणीम्।
परमानन्दमयी, कूष्माण्डे प्रणमाभ्यहम्॥

माँ कुष्मांडा जी की आरती 

कूष्मांडा जय जग सुखदानी।
मुझ पर दया करो महारानी॥

पिगंला ज्वालामुखी निराली।
शाकंबरी माँ भोली भाली॥

लाखों नाम निराले तेरे ।
भक्त कई मतवाले तेरे॥

भीमा पर्वत पर है डेरा।
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा॥

सबकी सुनती हो जगदंबे।
सुख पहुँचती हो माँ अंबे॥

तेरे दर्शन का मैं प्यासा।
पूर्ण कर दो मेरी आशा॥

माँ के मन में ममता भारी।
क्यों ना सुनेगी अरज हमारी॥

तेरे दर पर किया है डेरा।
दूर करो माँ संकट मेरा॥

मेरे कारज पूरे कर दो।
मेरे तुम भंडारे भर दो॥

तेरा दास तुझे ही ध्याए।
भक्त तेरे दर शीश झुकाए॥

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