लोहड़ी क्या है व क्यों मनाया जाता है और इसे मानाने के क्या है मायने

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Lohri भारत में मनाये जाने वाले प्रमुख त्योहारों मे से एक है। ये मुख्य रूप से सिख धर्म को मानने वाले लोग मानते है। लोहड़ी मकर संक्रांति के एक दिन पहले सूर्यास्त के बाद मनाया जाता है। हर वर्ष ये पर्व 12 या 13 जनवरी को मनाया जाता है और इस बार ये 13 जनवरी को मनाया जायेगा।

लोहड़ी का क्या है अर्थ

लोहड़ी में ल+ओह+ड़ी = लोहड़ी यानि लकड़ी+सूखे उपले+रेवड़ी

कैसे मनाई जाती है लोहड़ी

लोहड़ी आने के एक महीने पहले से ही बच्चे लोक-गीत गाकर लोहड़ी के लिए जरुरी सामान (लकड़ी, उपले) एकत्रित करने के लिए घर-घर जा कर पैसे एकत्रित करते है। इस समान को चौराहे या किसी खुले स्थान पर रखा जाता है। इसमें सुखी लकड़ियों के ऊपर उपलों को रखा जाता है। इसके बाद लोहड़ी वाले दिन सूर्यास्त के बाद पूजा की जाती है और मूंगफली, गुड़, रेवड़ी एवं तिल का भोग लगाया जाता है।

लोहड़ी ख़ुशी का पर्व है। इसका आयोजन मुख्य रूप से वो करते है जिनकी कोई इच्छा पूरी हुई हो, शादी या संतान का जन्म हुआ हो।

लोहड़ी में गाया जाने वाला प्रमुख गीत

सुंदर मुंदरिए होए
तेरा कौन विचारा होए
दुल्ला भट्टी वाला होए
दुल्ले ने धी ब्याही होए
सेर शक्कर पाई होए
कुडी दे बोझे पाई होए
कुड़ी दा लाल पटाका होए
कुड़ी दा शालू पाटा होए
शालू कौन समेटे होए
चाचा गाली देसे होए
चाचे चूरी कुट्टी होए
जिमींदारां लुट्टी होए
जिमींदारा सदाए होए
गिन-गिन पोले लाए होए
बड़े भोले आये होए
इक पोला घिस गया होए
जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया होए

लोहड़ी मानाने के पीछे की कहानी

लोहड़ी पर्व को दुल्ला भट्टी की एक कहानी से जोड़कर देखा जाता हैं। लोहड़ी के सभी गीत भी दुल्ला भट्टी से ही जुड़े हुए है।

मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में एक दुल्ला भट्टी नाम का व्यक्ति था। जोकि एक अच्छे स्वभाव वाला व्यक्ति था और उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

उसी समय संदल (अब पाकिस्तान में है) बार नाम की जगह पर लड़कियों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था। इसके बारे में जब दुल्ला भट्टी को पता चला तो उसने इसका विरोध किया और योजनाबद्ध तरीके से सभी लड़कियों को मुक्त करवाया व उनकी शादी हिन्दू लड़कों से करवाई।

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