MSP: क्या है और कैसे निर्धारित होती है फसलों की कीमत?

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MSP: हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है जहां कृषि को हमेशा प्राथमिकता दी गई है और समय-समय पर इसके उत्थान के लिए बेहतर विकल्पों को अपनाया गया है। हमारे देश की 50% से अधिक जनसंख्या कृषि कार्यों में संलिप्त है एवं भारत की जीडीपी (ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट) में 18% कृषि का योगदान है। इसीलिए सरकार द्वारा समय-समय पर इसकी दरों में वृद्धि के लिए कृषि सेवा योजनाएं एवं कानून बनाए व संशोधित किए जाते रहे हैं।

भारतीय किसानों में हमेशा से ही उनकी फसल का उपयुक्त मूल्य मिलने की उपेक्षा रही है। कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (Commission on Agricultural Cost & Price) की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी की घोषणा फसलों की बुवाई से पहले की जाती है, सरकार समय-समय पर हर फसल के लिए MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) निर्धारित करती है।

जिसे मुख्यतः कृषि लागत एवं मूल्य आयोग(सीएसीपी) द्वारा निश्चित किया जाता है जो कि एफसीआई (फ़ूड कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया) के अंतर्गत काम करती है। एमएसपी या न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर सरकार किसानों से उनकी फसल खरीदती है। यह मूल्य फसल की बुवाई से पहले निर्धारित किए जाते हैं, जिससे किसान बाजार मूल्य कम होने पर सरकार को फसल को निर्धारित न्यूनतम मूल्य पर बेंच सकते हैं।

ताकि किसान किसी फसल की बुवाई करने या न करने का निर्णय कर सकें इस प्रकार MSP किसानों को बाजार जोखिम (Market risk) के प्रति सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन अक्सर यह सुनने में आता रहा है कि किसानों से सरकार उनकी फसलों को ना खरीदकर उन्हें वापस कर देती है या किसान अपनी फसल की लागत से भी कम मूल्य सरकार द्वारा निर्धारित किए जाने के कारण अपना माल सरकारी गोदाम पर ही छोड़ देते हैं।

क्योंकि उस फसल को लाने ले जाने का किराया ही फसल के न्यूनतम समर्थन मूल्य से ज्यादा हो जाएगा यदि वे अपनी फसल को दोबारा मंडी लेकर जाएं और यदि किसान किसी तरह मंडी की तरफ रुख करते भी हैं तो वह अपनी फसल को ओने-पौने व अनुचित मूल्य पर बेचने को मजबूर होते हैं व उन्हें अपनी फसल का उपयुक्त मूल्य नहीं मिलता जिससे बड़ी संख्या में किसानों द्वारा आत्मदाह करना सामान्य बात हो गई थी।

एमएसपी या न्यूनतम समर्थन मूल्य पर चर्चा का मुख्य कारण हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा आर्थिक मामलों की मंत्रिमण्डलीय समिति‘ (Cabinet committee on Economic Affairs CCEA) द्वारा विपणन वर्ष 2020-21 हेतु खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price MSP) में वृद्धि को मंजूरी प्रदान की गयी है। जो कहीं ना कहीं किसानों के हित को दरकिनार करता है जिससे किसान परेशान है और आंदोलन के लिए बाध्य हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमण्डलीय समिति की बैठक में विपणन वर्ष 2020-21 के खरीफ की प्रमुख 14 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रस्तावों को मंजूरी दी गयी।

विपणन वर्ष 2020-21 के लिए खरीफ सीजन की कुछ प्रमुख अधिदिष्ट फसलों के एमएसपी में वृद्धि इस प्रकार की गयी है-

• कपास की लम्बे रेशे वाली फसल हेतु MSP को 5,550 रूपये प्रति क़्वींटल से बढ़ाकर 5,825 रूपये प्रति क़्वींटल तथा मध्यम रेशे वाली फसल के लिए 5,225 रूपये प्रति क़्वींटल से बढ़ाकर 5,515 रूपये प्रति क़्वींटल दिया गया है।

धान की फसल हेतु न्यूनतम समर्थन मूल्य में 1,815 रूपये प्रति क़्वींटल से वृद्धि करके 1,868 रूपये प्रति क़्वींटल कर दिया गया है।

• उपर्युक्त के अलावा काला तिल (नाइजरसीड) में 755 रूपये प्रति क़्वींटल तिल में 370 रूपये प्रति क़्वींटल उड़द में 300 रूपये प्रति क़्वींटल बाजरा में 83 प्रतिशत, तूर में 58 प्रतिशत और मक्का में 53 प्रतिशत की वृद्धि की गयी है (इनके एमएसपी में)।

भारत में एमएसपी की अवधारणा को लक्ष्मीकांत झा समिति की सिफारिशों पर 1965 में लागू किया गया था।

• एमएसपी के बारे में सुझाव तो कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा दिया जाता है, लेकिन इसके बारे में अंतिम निर्णय आर्थिक मामलों की मंत्रिमण्डलीय समिति (सीसीईए) द्वारा ही लिया जाता है। गन्ने के लिए एफआरपी के सन्दर्भ में भी इसी प्रक्रिया को लागू किया जाता है (रंगराजन समिति की सिफारिशों के आधार पर)।

वर्तमान में सरकार द्वारा कुल 22 फसलों के लिए एमएसपी की घोषणा की जाती है जिसमेंं से 14 खरीफ, 6 रबी और दो वाणिज्यिक फसलें हैं। सरकार द्वारा घोषणा तो 22 फसलों के लिए की जाती है किन्तु यह लागू 24 फसलों पर होती है। दो अन्य फसलें (तोरिया एवं डिहस्कड नारियल) की एमएसपी सरकार द्वारा घोषित अन्य दो फसलों (सरसों एवं नारियल) के मुताबिक होती है। तोरिया की एमएसपी सरसों और डिहस्कड नारियल (dehusked coconut) की नारियल के मुताबिक होती है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग द्वारा एमएसपी का सुझाव देते समय उत्पादन की लागतों को मुख्य आधार बनाया जाता है। इस संदर्भ में आयोग द्वारा पूर्व में सी-2 मानक (C2 standard) को ध्यान में रखा जाता था, किन्तु सरकार ने वित्तीय वर्ष 2018-19 से A2 + FL मानक को प्रयुक्त करने की घोषणा की।

वर्तमान में आयोग द्वारा A2 + FL मानक के आधार पर फसल की उत्पादन लागत निकाली जाती है और सरकार द्वारा एमएसपी का निर्धारण इसी उत्पादन लागत की तुलना में 50 प्रतिशत ऊपर किया जाता है।

उत्पादन लागत के मानक

भारत में फसलों के उत्पादन लागत को तय करने में दो मानक प्रचलन में हैं- (1) C2 मानक, (2) A2 + FL

किसानों को फसल उत्पादन में आने वाली लागतों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-

स्पष्ट लागतें (Explicit Costs) किसानों द्वारा फसल उत्पादन में वस्तु या मुद्रा के रूप में आने वाली लागतों को स्पष्ट लागत कहा जाता है।

• निहित लागतें (Implicit Costs) इसमें किसानों द्वारा फसल उत्पादन में प्रयुक्त स्वयं के साधनों को शामिल किया जाता है, यथा-स्वयं की भूमि, स्वयं की पूँजी और पारिवारिक श्रम।

C2 के मानक में उपर्युक्त सभी लागतों को ध्यान में रखा जाता है इसलिए इसे व्यापक लागत (Comprehensive Cost) कहा जाता है।

A2 + FL मानक में सभी प्रकार की स्पष्ट लागतों (भूमि का किराया सहित) को शामिल किया जाता है किन्तु निहित लागतों में सिर्फ पारिवारिक श्रम को शामिल किया जाता है। इसमें पारिवारिक श्रम के लिए एक अनुमानित मजदूरी को शामिल कर लिया जाता है।

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निष्कर्ष- इस लेख हमने जाना की MSP क्या है । इसका आसान शब्द में यही अर्थ है की किसानो को फसल का एक उचित मूल्य मिल सके और उसका कोई अन्य नुकसान न हो। न्यूनतम समर्थन मूल्य का निर्धारण कैसे किया जाएगा , उत्पादन लागत के मानक क्या है जैसे विषय समझे । उम्मीद है आपको यह लेख पूरी तरह से समझ आया होगा तथा MSP की पूर्ण जानकारी हो गई होगी।

Writer Name:- Kriti Varshney

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