महान क्रन्तिकारी खुदीराम बोस, जिन्हे भगत सिंह से भी कम उम्र में हुई थी फांसी

Freedom fighter khudiram bose
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खुदीराम बोस देश के एक ऐसे क्रांतिकारी थे। जिनसे अंग्रेज भी खौफ खाते थे। खुदीराम बोस सबसे युवा और महान क्रांतिकारियों में से एक थे। इन्होंने देश के आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई और भगत सिंह की तरह बहुत कम उम्र में देश की आजादी के लिए लड़ते हुए अपने प्राण निछावर कर दिए।

पश्चिम बंगाल में हुआ था जन्म

खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसंबर 1889 को पश्चिम बंगाल के जिला मिदनापुर के हबीबपुर गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम त्रैलोक्य नाथ बोस और माता का नाम लक्ष्मी प्रिया देवी था।

बचपन में ही इनके सदस्य मां बाप का साया उठ गया था इसके बाद इनकी बड़ी बहन ने मां-बाप की तरह परवरिश की। इन्होंने अपने शुरुआती पढ़ाई पश्चिम बंगाल के हैमिल्टन हाई स्कूल से की थी।

पढ़ाई छोड़ आजादी की लड़ाई में हुए शामिल

पढ़ाई के दौरान इनका ध्यान अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किए जा रहे अत्याचारों पर गया। जिससे इनको बहुत क्रोध और दुख हुआ। स्कूल से ही इन्होंने राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे और पढ़ाई छोड़ कर अंग्रेजो के खिलाफ होने वाले आंदोलन में शामिल होने लगे।

इसके बाद खुदीराम बोस ने बंगाल विभाजन के विरोध में हो रहे आंदोलनों में शामिल हुए और आगे बढ़ कर अंग्रेजो के खिलाफ आवाज उठाने लगे और खुदीराम बोस सबसे युवा क्रांतिकारी के रूप में उबर कर सामने आए। बता दें तब खुदीराम बोस मात्र 16 वर्ष के थे।

1907 में अंग्रेजों की नजर में चढ़े खुदीराम बोस

खुदीराम बोस सबसे युवा व निडर क्रांतिकारी थे और देश के युवाओं के लिए एक प्रेरणा स्रोत बन चुके थे। बड़े-बड़े आंदोलनकारी भी उनसे बहुत प्रभावित थे। अंग्रेजो के खिलाफ उन्होंने कई आंदोलन की है और उनका नेतृत्व भी किया।

इस दौरान उन्होंने कई अंग्रेज अधिकारियों पर हमला किया और पुलिस स्टेशनों के पास बम ब्लास्ट किए। यही नहीं उन्होंने कई डाकघरों को भी लूटा। इस तरह के कई क्रांतिकारी गतिविधियों को खुदीराम बोस ने अंजाम दिया जिसके बाद वे अंग्रेजों की नजर में चल गए और उनके खिलाफ देशद्रोह का केस चलाया गया। तब वे 17 वर्ष के थे इसलिए उन्हें छोड़ दिया गया।

खुदीराम बोस को एक चूक पड़ी भारी

1808 तक खुदीराम बोस अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कई आंदोलन कर चुके थे जिसकी वजह से वे उस समय के क्रांतिकारी नेताओं की पहली पसंद बन गए थे। उस समय ब्रिटिश मजिस्ट्रेट किंग्स फोर्ड का अत्याचार बढ़ने लगा। वो क्रांतिकारियों को बहुत सख्त सजा सुनाता था। जिसकी वजह से आजादी के लिए होने वाले कई आंदोलन करें।

मजिस्ट्रेट किंग फोर्ड के अत्याचारों से परेशान होकर युगांतर दल के नेता वीरेंद्र कुमार घोष ने उन्हें मारने का फैसला किया और इसके लिए उन्होंने खुदीराम बोस प्रफुल्ल चाकी को चुना। यह दोनों वीर क्रांतिकारी भी खुशी-खुशी तैयार हो गया और 30 अप्रैल 1908 को किंग फोर्ड को मारने का फैसला किया।

इसके बाद कुछ दिनों तक किंग फोर्ड पर खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने नजर रखी। 30 अप्रैल की रात को जब किंग फोर्ड अपनी बग्घी से कहीं जा रहा था तभी खुदीराम और प्रफुल्ल ने उसपर बम फेक दिया। लेकिन इस हमले में किंग फोर्ड बच गया और दुर्भाग्यवश उसकी पत्नी और बेटी मारे गए।

19 वर्ष की आयु में देश के लिए दी जान

खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी को लगा कि किंग फोर्ड मारा गया और वो वहां से निकल गए। लेकिन रास्ते में उन्हें पुलिस ने घेर लिया प्रफुल्ल ने खुद को गोली मार ली। जबकि खुदीराम बोस को पुलिस ने पकड़ लिया और हत्या का केस उन पर चलाया गया। इस दौरान भी वे डरे नहीं और उन्होंने हमले करने की बात को स्वीकार किया। जिसकी वजह से उन्हें कोर्ट ने 13 जुलाई को फांसी की सजा सुना दी। इसके बाद 11 अगस्त 1908 को सबसे युवा और महान क्रांतिकारी खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई।

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