जाने, आज ही के दिन संसद भवन पर कैसे हुआ था सबसे बड़ा आतंकी हमला

image source- google

भारत की राजधानी दिल्ली में स्थित दुनिया में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर भारत के “संसद भवन”( Parliament ) पर आज ही के दिन यानी 13 दिसम्बर 2001 को आतंकी हमला हुआ था। जिसमे हमारे देश के कई जवानों ने संसद भवन की रक्षा करते हुए अपनी जान न्योछावर कर दी थी। आतंकवादियों ने भारत की हिम्मत को तोड़ने की साजिश रची थी लेकिन उनकी इस साजिश को हमारे देश के संसद भवन में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने कामयाब नहीं होने दिया। तो चलिए हम आपको संसद भवन के हमले से जुडी पूरी जानकारी कैसे हुआ, कब हुआ, किसने किया और कितने लोग मारे गए, के बारे में बताते हैं।

कैसे हुआ था संसद भवन पर हमला

13 दिसम्बर 2001 को सुबह लगभग 11 बजकर 25 मिनट पर यह हमला हुआ। संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था, हमेशा की तरह ही इस दिन भीं संसद की कार्यवाई संचालित हुई । 1999 में हुए कारगिल युद्ध में तत्कालीन सरकार उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे, पर हथियारों और ताबूत के घोटाले का विपक्ष की पार्टी ने आरोप लगाया था। इसलिए ताबूत घोटाले की चर्चा 13 दिसंबर 2001 को संसद भवन में हो रही थी। विपक्ष के जोरदार हमले से संसद में काफी शोर शराबा होने लगा। उस समय विपक्ष की नेता सोनिया गांधी थी। संसद में दोनों पक्षों में काफी शोर शराबा होने के कारण संसद की कार्यवाई को स्थगित कर दिया गया था। संसद स्थगित होने के बाद प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजयेयी और विपक्ष की नेता सोनिया गांधी अपने-अपने सरकारी आवास के लिए निकल चुकी थी। लेकिन हमेशा की तरह कुछ सांसद, गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी और उप राष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा अभी भी लोकसभा में ही मौजूद थे। संसद भवन में तैनात सिक्युरिटी ऑफिसर्स के वायरलेस पर मेसेज आया कि उप राष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा अपने आवास के लिए निकलने वाले हैं। यह मैंसेज मिलने के बाद उनके काफिले की गाड़ियां गेट नंबर 11 के सामने लाइन में खड़ी कर दी गईं।

कैसे आये थे आतंकवादी

उप राष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा की काफिले की गाड़ियां गेट नंबर 11 पर खड़ी होने के बाद ही वहां मौजूद सुरक्षा अधिकारीयों ने देखा की एक सफ़ेद रंग की ऐम्बेस्डर कार काफिले की तरफ यानी गेट नंबर 11 की तरफ आ रही है। संसद भवन में ऐसी कार आना आम बात है, लेकिन उप राष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा का काफिला लिकलने वाला था इस समय वहां का आवागमन रोक दिया जाता है। इसके बावजूद भी एंबेस्डर कार संसद भवन के अंदर आ रही थी। इतने में वहां पर तैनात सुरक्षा गार्ड जगदीश यादव इस कार का पीछा करने लगे। ऐंबैसडर का ड्राइवर हड़बड़ाया हुआ लग रहा था। वह अपना संतुलन खो चूका था जिसके कारण सफ़ेद एम्बेस्डर उप राष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा की गाड़ी से टकरा गई। जगदीश यादव को यूं बेतहाशा भागते देख उप राष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा के सुरक्षाकर्मी एएसआई जीत राम, एएसआई नानक चंद और एएसआई श्याम सिंह भी अंबेस्डर कार को रोकने की कोशिश में उसकी तरफ भागे। यह सब देखते ही देखते एंबेस्डर कार के चारों दरवाजे एक साथ खुलते हैं और गाड़ी में बैठे पांच आतंवादी तेजी से बाहर निकलते हैं और अंधाधुंध गोलियां बरसानी शुरू कर देते हैं। पांचों एके-47 से लैस थे। पांचों के पीठ और कंधे पर बैग थे। इस प्रकार शुरू हुआ था हमला।

जान पर खेल गए सुरक्षाकर्मी

image source- google

इतिहास में पहली बार लोकतंत्र के मंदिर संसद भवन पर हुआ था आतंकी हमला। पूरा संसद भवन गोलियों की त़ड़तड़ाहट से गूंज उठा था।आतंकवादियों के पहले हमले का शिकार बने वे चार सुरक्षाकर्मी जो एंबेस्डर कार को रोकने की कोशिश कर रहे थे। अब तक दिल्ली पुलिस तथा सीआरपीएफ के जवान संसद भवन भारी संख्या में पहुँच चुके थे। अभी तक पाँचों आतंकवादी जिन्दा थे और लगातार गोलियों की बौछार कर रहे थे सीआरपीएफ के जवानों ने आतकवादियों का मुकाबला किया और फिर दोनों तरह से गोलाबारी होने लगी। इतने समय में एनएसजी कमांडो और सेना को भी हमले की खबर दी जा चुकी थी।

इस तरह आतंकवादी हुए ढ़ेर

पहला आतंकवादी संसद भवन में गोलियां बरसाते हुए घुसने की कोशिश कर रहा था की इतने में सुरक्षा बालों की गोली उसको लग गई और वह वहीँ पर गिर गया। गिरने के बाद उसने रिमोट का बटन दबाकर अपने आप को उड़ा लिया। अभी भी चार आतंकी जिन्दा थे और लगातार गोलियां बरसा रहे थे। लेकिन अब यह बहुत ज्यादा घबरा चुके थे क्योंकि सुरक्षा बलों ने इनको चरों तरफ से घेर लिया था। इतने में एक खबर मिली की गेट नंबर 5 पर एक आतंकी और ढ़ेर हो गया है। अभी भी तीन आतंकवादी जिन्दा थे और अब उनको पता चल चूका था की यहाँ से जिन्दा बाहर नहीं जा सकते है, इसलिए ये तीनो अपनी जान की परवाह न करके गेट नंबर 9 से संसद भवन के अंदर घुसने की दोबारा कोशिश की। लेकिन सुरक्षा कर्मियों ने इन तीनों आतंकवादियों को गेट नंबर 9 पर दबोच लिया। अब पूरी घटना गेट नंबर 9 पर आकर रुक गई, आतंवादियों को भागने का कोई रास्ता नहीं था एक-एक करके सभी आतंवादी मार दिए गए।