कबीर दास जी का जीवन और उनसे जुड़े कुछ मूल मन्त्र

kabir das jeevani
Image source - The Hindu Portal

अयोध्या में राम जन्म भूमि पूजन में भले ही विपक्षी पार्टी के नेताओं और समाज के दूसरे पक्षों के लोगों को नहीं बुलाया गया हो। लेकिन भूमि पूजन के लिए बहुत से धार्मिक स्थलों की मिट्टी जरूर लाई गयी।

ऐसे ही काशी के लहरतारा मठ की मिट्टी भी राम मंदिर के निर्माण के लिए अयोध्या भेजी गयी। कबीर दास जी ने अपने जीवन में हमेशा ही सभी धर्मों को एक साथ मिल जुलकर रहने की शिक्षा दी।

कबीर दास का जीवन हमेशा ही समाज की कुरीतियों पर कुठाराघात करता रहा है। धर्म के साथ- साथ वो जाति व्यवस्था के भी आलोचक कहे जा सकते हैं। अपने एक दोहे के माध्यम से कबीर दास जी कहते हैं।

“जाति ना पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान |

मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान ||”

अर्थात साधु या ज्ञानी पुरुष की जाति नहीं पूछनी चाहिए बल्कि उसके ज्ञान को महत्व देना चाहिए। जिस तरह से तलवार का मोल होता है म्यान का कोई मोल नहीं होता।

लेकिन विडंबना ये है कि भक्तिकाल के बाद आज 21 वीं शताब्दी में भी धर्म और जाति के नाम पर लोगों के बीच की दीवारें उसी तरह से खड़ी है। हमारा समाज कभी समझ ही नहीं पाया की जाति और धर्म को राजनीतिक पार्टियां हमेशा ही अपने फायदों के लिए प्रयोग करती आ रही है। कबीर दास जी का जीवन लोगों को सामाजिक भ्रांतियों से दूर रखने पर ही टिका रहा। वे हमेशा इन सभी भ्रांतियों से दूर रखना चाहते थे जिसमें वो सफल भी हुए।

राम मंदिर आंदोलन से एक पार्टी को बहुत ज्यादा फायदा हुआ है और राम राज्य की स्थापना के नाम पर भारत और सबसे ज्यादा लोक सभा सीटो वाले उत्तर प्रदेश में भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार आ गयी।

आडंबरों के विरोधी थे कबीर

कबीर जी ने अपने जीवन में धर्म और ईश्वर की पूजा के नाम पर दिखावे और आडंबरों का विरोध किया है। वो सच्चे गुरु के महत्व को संसार को समझाना चाहते थे।

Kabir Das जी का जीवन परिचय और Kabir Ke Dohe

संसार सागर से पार होने के लिए एक सच्चे गुरु की आवश्यकता होती है | कबीर जी अपने एक दोहे में गुरु की महिमा का वर्णन इस प्रकार करते हैं।

“गुरु को सिर पर धारिये, रहो आज्ञा महि |

कहे कबीर सो दास को तीन लोक भय नहीं ||”

अर्थात जिसके सिर पर गुरु का हाथ हो और जो गुरु के वचनों को मानता हो उसे तीनों लोकों में डरने की जरूरत नहीं है।

आज के समय में हमारे समाज को कबीर दास जैसे संतों की जरूरत है। ऐसा इसलिए क्योंकि जिस धर्म निरपेक्षता का घुमान भारत के लोगों को आज तक था इस समय में वो भी कहीं धूमिल सा होने लगा है।

राम कबीर जी को बहुत प्रिय थे वो राम के बड़े उपासक माने जाते हैं। कबीर जी के अनुसार जो कण- कण में बसता है वही राम है।

साहित्य के माध्यम से दिए सन्देश

ईश्वर की प्राप्ति के लिए संगीत और कविताएं ईश्वर प्राप्ति का माध्यम हमेशा से रही हैं। कबीर जी अपने दोहों के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों को हमेशा चुनौती दी है।

कबीर दास की वाणी को बीजक में संग्रहित किया गया है। कबीर दास उस समय के महान कवि थे और साहित्य में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।

आज भी जरूरत है उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने की। केवल राम का नाम लेने से राम राज्य और राम प्राप्ति तो नहीं आ सकती लेकिन सरकारें बदली जा सकती है।

राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है और हो सकता है राम ही अब संसार में वो बदलाव ला सके जिसमें सभी मिल जुल कर प्रेम से रह सकते हैं। राम कबीर जी को बहुत प्रिय थे उनके बारे में कबीर जी ने बहुत से दोहे लिखे हैं। जैसे कि

“राम नाम तिहुं लोक मे सकल रहा भरपूर।

जो जाने तिही निकट है, अनजाने तिही दूर।।”

अर्थात राम का नाम तीनों लोकों में व्याप्त और सफल है। जो राम में विश्वास रखते हैं राम उनके पास हैं और जो राम में विश्वास नहीं रखते उनसे दूर हैं। राम के आदर्शों को जीवन में अपनाने की जरूरत है जिससे हर कोई आपस में मिल जुल कर प्रेम से रहे।

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