फिल्मों में अश्लीलता जरुरी है या मज़बूरी ?

भारत में सिनेमा समंदर के रास्ते से आया। और आज भारत दुनिया सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्रीज़ में से एक है। शुरुआत से ही भारतीय सिनेमा पर वेस्टर्न प्रभाव हावी रहा है। इंटरनेट के इस दौर में सिनेमा का स्वरूप और कहानी कहने के तरीके में काफी बदलाव आया है। आजकल webseries का दौर है और ज़्यादातर फ़िल्म निर्माता और निर्देशक ज़्यादा से ज़्यादा webseries बनाने पर फ़ोकस कर रहे हैं।

आजकल ज़्यादातर webseries में जो एक बात कॉमन है वह है गैरज़रूरी हिंसा और अश्लीलता मिर्जापुर से लेकर सेक्रेड गेम्स तक इन सभी webseries में गैरजरूरी हिंसा और अश्लीलता को खूब बेंचा गया है। मिर्ज़ापुर में कालीन भैया की वाइफ का घर के नौकर के साथ अफेयर होता है जिसका फ़ायदा कालीन भैया के अपंग पिता जी उठाते हैं। इस webseries में बहू और ससुर के बीच इंटीमेट सेंस भी फिल्माया गया है। एक सभ्य परिवार में इस तरह की घटना अशोभनीय, अकल्पनीय है। कमाल की बात ये है कि इसे लेकर किसी संगठन कोई कोई आपत्ति नहीं है।

निर्माताओं के पास इसका एक ही रटा रटाया जवाब होता है कि ऐसे सेंस कहानी की डिमांड के हिसाब से फिल्माए जाते हैं।

एक कोई नई बात नहीं सदियों से ऐसा ही होता आया है। साहित्य में वल्गैरिटी की कोई जग़ह नहीं हैं। लेकिन वल्गैरिटी का अपना एक साहित्यिक इतिहास है।
अश्लील साहित्य का एक बहुत बड़ा मार्केट है। लोगों के बीच अश्लील साहित्य की डिमांड मेनस्ट्रीम साहित्य से ज़्यादा है। यही कारण है कि तमाम ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग websites और ऍप्स ऐसे अश्लील कामुक कंटेंट्स से भरे पड़े हैं। हैरानी की बात तो यह है कि इन कंटेंट्स पर मिलियंस व्यूज आते हैं। अल्ट्बालाजी नामका एक चैनल है जो केवल ऐसे ही कामुक और अश्लील webseries बनाता है। लोग इन कंटेंट्स को पूरे मजे से देखते हैं लेकिन अपनी पब्लिक इमेज ख़राब होने के डर से इस पर चर्चा करने से बचते हैं।

लेकिन क्या वास्तव में अश्लीलता कहानी की डिमांड होती है या इसे जानबूझकर कहानी में ठूसा जाता है। और सबसे बड़ा सवाल की इन अश्लील दृश्यों को किस तरीक़े से फ़िल्माया जाया कि वह वल्गर न लगे।

बात करें पुरानी हिंदी फिल्मो की तो, फिल्म की कहानी कुछ भी हो पहले के फ़िल्मकार फ़िल्म की कहानी में एक रेप का दृश्य जरूर डालते थे। लेकिन उनका फिल्मांकन बड़ा क्लासी होता था। एक दृश्य में विलन नायिका के ऊपर झपटता है तो अगले दृश्य नायिका छत-विछत कपड़ो के साथ रोती हुई नज़र आती है। दर्शक समझ जाते हैं कि क्या हुआ रहा होगा। लेकिन आज कल की फ़िल्मो में नायक नायिका रोमांस में नायक नायिका के कपड़े उतरता हुआ दिखाई देता है। इस तरह का रोमांस कतई वल्गर लगता है। फ़िल्मकारों का तर्क़ होता है कि वो रियलिटी दिखाने की रहे हैं। अरे भाई ऐसी रियलिटी दिखानी है तो जाकर पोर्न फिल्में बनाओ।

एक और सवाल यह है कि शीर्ष फ़िल्म अभिनेत्रियाँ क्यों अपने ऊपर इस तरह के दृश्य फिल्माने को राजी होती है। उत्तर है गलाकाट कम्पटीशन ! यदि वो नहीं करेगी तो कोई और कर लेगा।

आपको क्या लगता है वल्गैरिटी फिल्मों में जरुरी है या फिल्मकारों की मज़बूरी है। कृपया हमें कमेंट कर के जरूर बतायें।

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