मक्खीचूस सेठ ने घी से बनवाया था ये अद्धुत मंदिर, पूरी दुनिया में है मशहूर

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कोई भी घटना या परिणाम हमारे हाथ में नहीं होता लेकिन हम उसे किस तरह संभालते हैं ये हमारे हाथ में होता है। जब कोई हमें ताना मारता है तो हमारे दिल को काफी चोट पहुंचती है। दिलो-दिमाग में तरह-तरह के सवाल उठते हैं। वहीं कई लोग ऐसे भी होते हैं जो ताने सुनकर उसे इग्नोर कर देते हैं या भूल जाते हैं। वहीं कई लोग इससे डिप्रेशन में तक आ जाते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो तानों को एक चैलेंज की तरह लेते हैं और एक मिसाल कायम कर जाते हैं। दुनिया उसे सलाम करती है और ताना मारने वाले लोग बाद में शर्मिंदा होते हैं। आज हम कुछ ऐसी ही एक रोचक घटना बताने जा रहे हैं। जिसे सुनकर आप भी वाह कह उठेंगे।

आपको बता दें, एक सेठ पर ताने का असर ऐसा हुआ कि वो पूरी दुनिया में ही मशहूर हो गया। आपको बता दें, इस सेठ की कहानी एक शानदार मंदिर से जुड़ी हुई है। ये तो सबको पता है कि, कोई घर या मंदिर बनाने के लिए सीमेंट, बालू, ईंट और पानी का इस्तेमाल होता है, लेकिन अगर हम कहें कि एक मंदिर का निर्माण पानी की जगह घी से हुआ है तो शायद आप हैरान हो जाएं, लेकिन ये सच है। ये मंदिर है राजस्थान के बीकानेर में  स्थित विश्व प्रसिद्ध भांडाशाह जैन मंदिर। भांडाशाह जैन मंदिर की नींव का निर्माण शुद्ध देसी घी से किया गया था। बीकानेर के इस मंदिर का यही अनोखा सच है।

चलिए अब हम इस अनोखे मंदिर के अनोखे इतिहास के बारे में आपको बता दें, रेत के टीलों का शहर बीकानेर, दूर तक फैला रेगिस्तान, शानदार महल और सुंदर हवेलियां राजस्थान के गौरव का प्रतीक हैं। वैसे तो बीकानेर शहर को भुजिया रसगुल्ला व पापड के लिए विश्व प्रसिद्व माना जाता है। वहीं इस शहर की एक और सबसे खास बात है यहां का विश्व प्रसिद्ध भांडाशाह जैन मंदिर। बीकानेर के पुराने शहर की चारदीवारी के बीच बड़ा बाजार बसा है। इस बाजार में भांडाशाह नाम के एक घी के व्यापारी ने सन् 1468 में एक जैन मंदिर बनवाना शुरु करवाया था और मंदिर निर्माण का काम उनकी बेटी ने सन् 1541 में पूरा करवाया था।

भांडाशाह के नाम पर ही मंदिर का नाम भांडाशाह मंदिर पड़ा। 108 फुट ऊंचे जैन मंदिर में पांचवें तीर्थकर भगवान सुमतिनाथ जी मूल वेदी पर विराजमान हैं।

इतिहासकार डॉ. शिव कुमार भनोत कहते हैं कि सेठ भांडाशाह जब मंदिर निर्माण के बारे में विचार विमर्श कर रहे थे, तभी एक मख्खी घी में गिर गई। सेठ ने उस मख्खी को घी से निकाला और निचोड़ कर फेंक दिया, जिस पर पास खड़े व्यक्ति ने ताना मारते हुए कहा था कि जो कंजूस सेठ घी में पड़ी मख्खी को निचोड़ कर फेंक सकता है वो मंदिर क्या बनाएगा। बस इसी ताने को दिल पर लेते हुए सेठ भांडाशाह ने 40 हजार किलोग्राम घी को मंदिर की नींव में इस्तेमाल कर डाला।

मंदिर निर्माण के समय इसकी नींव में शुद्ध देसी घी डलवाए जाने और अपनी स्थापत्य कला की वजह से ये मंदिर दुनिया भर में फेमस है। इसी कारण इस मंदिर को विश्व की प्रमुख ट्रेवल एजेंसी ट्रिप एडवाइजर ने भारत के प्रसिद्ध जैनालयों में शामिल किया है। मंदिर के 500 साल पूरे होने पर डाक विभाग ने विशेष आवरण और विरुपण जारी किया था। बताया जाता है, मंदिर में बने भित्ति चित्रों में सोने के लगभग 700 वर्ग लगाए गए हैं।

ये पूरा मंदिर तीन मंजिलों में बंटा हुआ है और लाल बलुआ पत्थरों और संगमरमर का बना है। इस मंदिर के भीतर की सजावट बेहद सुंदर है इसमें आरसी का शानदार काम किया गया है.. मंदिर के अंदर के भित्ति चित्र और मूर्तियां भी बेहत आकर्षक हैं। मंदिर के फर्श, छत, खम्भे और दीवारें मूर्तियों और चित्रकारी से सजाए गए हैं।

बताया जाता है मंदिर का निर्माण गोदा नाम के वास्तुशात्री की देखरेख में किया गया था। वास्तुशात्री गोदा की याद में परकोटा युक्त बीकानेर नगर के रांगडी चौक में पत्थर की सुंदर चौकी बनाई है। ये चौकी सुंदर नक्काशी के लिए प्रसिद्ध है। भांडाशाह जैन मंदिर का वास्तविक नाम त्रैलोक्य दीपक प्रसाद है। यह धर्मस्थल बीकानेर के मंदिर स्थापत्य कला का अद्भुत प्रतीक माना जाता है।

 

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